aajkhabar.in https://aajkhabar.in/ News website Wed, 27 May 2026 10:53:24 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=7.0 https://aajkhabar.in/wp-content/uploads/2026/03/cropped-cropped-aajkhabar-Logo04-32x32.png aajkhabar.in https://aajkhabar.in/ 32 32 प्रखर राष्ट्रवाद में ओझल सावरकर का भाषाई योगदान https://aajkhabar.in/discussion/veer-savarkars-linguistic-contribution-overshadowed-by-ardent-nationalism/ https://aajkhabar.in/discussion/veer-savarkars-linguistic-contribution-overshadowed-by-ardent-nationalism/#respond Wed, 27 May 2026 10:53:24 +0000 https://aajkhabar.in/?p=6921 -प्रो. एस.के.सिंह दुनिया में ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे जहां पर किसी व्यक्ति का...

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-प्रो. एस.के.सिंह

दुनिया में ऐसे बहुत से उदाहरण मिल जायेंगे जहां पर किसी व्यक्ति का जब एक विशेष पक्ष लोकप्रियता के शिखर पर होता है तो उसकी छाया में व्यक्ति की दूसरी महत्वपूर्ण विशेषतायें ओझल हो जाती हैं। नोबेल पुरस्कार विजेता रवीन्द्रनाथ टैगोर की पहचान वैश्विक स्तर पर एक महान दार्शनिक एवं शिक्षाविद् के रूप में है, किंतु इन उपलब्धियों की छाया में उनकी एक दूसरी महत्वपूर्ण विशेषता पेंटिंग (चित्रकला) की प्रतिभा दबकर रह गई एवं उसकी पर्याप्त चर्चा नहीं हो पायी।

वस्‍तुत: इसी तरह प्रखर क्रांतिकारी रणनीतिकार एवं कालापानी की कठोर यातनायें सहने वाले स्वतंत्रता सेनानी विनायक दामोदर सावरकर (वीर सावरकर) की क्रांतिकारी छवि एवं उनके व्यापक संघर्षों की छाया में उनका महत्वपूर्ण ‘भाषाशुद्धि आन्दोलन’ जन-मानस में उतनी ख्याति नहीं पा सका, जिसका कि वह आन्दोलन हकदार था। उन्होंने देवनागरी लिपि को आधुनिक मुद्रण एवं टंकण के अनुरूप बनाने हेतु अनेक व्यावहारिक सुझाव प्रस्तुत किये।

इतना ही नहीं, इसके अलावा इतिहास लेखन के माध्यम से औपनिवेशिक दृष्टिकोण को चुनौती देते हुए भारतीय इतिहास की तार्किक एवं गौरवपूर्ण पुनर्व्‍याख्‍या प्रस्तुत की। सावरकर के प्रखर राष्ट्रवादी व्यक्तित्व के प्रभाव में उनका गंभीर अकादमिक एवं बौद्विक योगदान प्रायः ओझल ही रहा। एतिहासिक दृष्टि एवं तथ्‍यों के आधार पर देखें तो मुगलकाल में फारसी-अरबी का प्रभुत्व तथा औपनिवेशक काल में अंग्रेजी के वर्चस्व के कारण भारत को भाषाई स्तर पर भारी चुनौतियों और उथल-पुथल का सामना करना पड़ा है। 17वीं शताब्दी में छत्रपति शिवाजी महाराज की ‘राजभाषा नीति’ और 20वीं शताब्दी में विनायक दामोदर सावरकर द्वारा चलाए गए ‘भाषाशुद्वि आंदोलन’ ऐसे प्रमुख उदाहरण हैं, जिनके माध्यम से भाषाई अतिक्रमण की चुनौतियों का प्रतिकार किया गया।

सावरकर की 1926 में प्रकाशित पुस्तक ‘भाषाशुद्वि’ उनके आंदोलन की वैचारिक आधारशिला बनी। यह केवल व्याकरण संबंधी पुस्तक नहीं बल्कि सावरकर जी के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का एक महत्वपूर्ण स्तम्भ है। अत्यधिक विदेशी शब्दों के प्रयोग को वे बौद्विक गुलामी का प्रतीक मानते थे। इस पुस्तक के माध्यम से उन्होंने मराठी में घर कर गये उर्दू, अरबी एवं फारसी के शब्दों के स्थान पर संस्कृतनिष्ठ और प्राकृतिक मूल के शब्दों के प्रयोग का आव्हान किया।

वस्‍तुत: उनका मानना था कि भारतीय भाषाओं को अधिक सामथ्र्यवान तथा मौलिक बनाने के लिये उन्हें अपनी मूल जड़ संस्कृत से जुड़ना होगा। इसके साथ ही उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भाषाशुद्वि का लक्ष्य किसी का अंधा विरोध नहीं बल्कि शब्दों का विवेकपूर्ण चयन करना है। उन्होंने कहा कि अन्य भाषाओं के श्रेष्ठ शब्द अपनाने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए, लेकिन जहां देशी शब्द उपलब्ध हों वहां विदेशी शब्दों का प्रयोग नहीं किया जाना चाहिए।

सावरकर जी ने न केवल पूर्णतः नवीन शब्दों का निर्माण किया बल्कि उन्होंने भाषा में पहले से मौजूद शब्दों को पुनर्जीवित तथा पुनः परिभाषित भी किया। उन्होंने मेयर के लिये ‘महापौर’, टेलीग्राम के लिये ‘तार’, लाउडस्पीकर के लिये ‘ध्वनिवर्धक’, कॉलेज के लिये ‘महाविद्यालय’, कॉलम के लिये ‘स्तम्भ’, स्पेशल इश्यू के लिए ‘विशेषांक’ और प्रोफेसर के लिये ‘प्राध्यापक’ जैसे शब्दों का सृजन किया। इसके अतिरिक्त भाषाशुद्वि के लिहाज से सावरकर जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान उन शब्दों को पुनःस्थापित करना माना जाना चाहिये जो व्यवहार से लुप्त हो चुके थे।

उन्होंने बहुत से संस्कृत और मराठी शब्दों को आधुनिक संदर्भ में पुनःप्रचारित एवं प्रतिस्थापित किया। उदाहरण के लिये उन्होंने स्कूल के लिये ‘शाला’, गवर्नेन्स के लिये ‘शासन’, हेडमास्टर के लिये ‘मुख्याध्यापक’ जैसे पहले से मौजूद शब्दों को आधुनिक संस्थागत प्रयोग में लाने का आव्हान किया। उनका मानना था कि भाषाशुद्वि का अर्थ केवल नये शब्दों का निर्माण करना ही नहीं, बल्कि पहले से मौजूद शब्दों को पुनःस्थापित करना और भाषा की खोई हुई जीवंतता को पुनः प्राप्त करना भी है।

विश्रामगृह, प्रशिक्षण, संसद, न्यायालय, जनपद, आरक्षण, विशेषाधिकार, अभियंता, अनुमोदन, प्रतिवेदन, परिषद, राजदूत, दिनांक, दिग्दर्शक जैसे शब्दों को पुनः प्रतिस्थापित करने का श्रेय सावरकर जी को ही जाता है। उन्होंने सैद्धांतिक पक्ष से अधिक व्यवहारिक क्रियान्वयन पर बल दिया तथा अपने भाषणों, ग्रन्थों में उर्दू एवं अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग बंद कर दिया।

अत: आज राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 मातृभाषा में शिक्षण तथा भारतीय ज्ञान परंपरा पर विशेष बल दे रही है, जिससे भारतीय ज्ञान परंपरा को पुनः स्थापित किया जा सके। इन परिस्थितियों में सावरकर जी का ‘भाषाशुद्वि आंदोलन’ और भी महत्वपूर्ण एवं प्रासंगिक हो जाता है। वर्तमान समय में इसे नये संदर्भ में देखा जाना चाहिये। आज जब भारत एक वैश्विक शक्ति के रूप में स्थापित हो रहा है तब यह आवश्यक हो जाता है कि हम ज्ञान का सृजन अपनी भाषाओं में करें। हमें केवल अनुवाद पर निर्भर नहीं रहना चाहिये। इसके लिये शिक्षण संस्थानो में ‘भाषा नियोजन’ को एक स्वतंत्र अकादमिक अनुशासन के रूप में स्थापित किया जाना आवश्यक है।

सावरकर जी के अनुसार भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं होती बल्कि वैचारिक स्वायत्तता, सांस्कृतिक स्वावलंबन, स्वतंत्रता तथा स्वाभिमान का प्रतीक भी होती है। स्वदेशी शब्दावली के पुनरूत्थान में सावरकर जी का अद्वितीय योगदान है। उनका दर्शन एवं साहित्यक कृतियां आज भी भारतीय बौद्विक और अकादमिक जगत के लिये एक महत्वपूर्ण आधार हैं। उनकी वैज्ञानिक दृष्टि और भाषाई योगदान उन्हें एक महान विचारक और शिक्षाविद के रूप में स्थापित करता है। उनके द्वारा गढ़े गये प्रशासनिक, तकनीकी एवं संसदीय शब्द आज भी हमारी लोकतांत्रिक और अकादमिक शब्दावली में जीवंत हैं।

(लेखक जीवाजी विश्वविद्यालय में वाणिज्य एवं व्यवसाय अध्ययनशाला विभागाध्यक्ष हैं)

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(पुण्‍य स्‍मरण) सेवा, साधना और संवेदना के पर्याय अनिल माधव दवे https://aajkhabar.in/discussion/an-embodiment-of-service-spiritual-discipline-and-compassion-anil-madhav-dave/ https://aajkhabar.in/discussion/an-embodiment-of-service-spiritual-discipline-and-compassion-anil-madhav-dave/#respond Mon, 18 May 2026 11:40:27 +0000 https://aajkhabar.in/?p=6917 -डॉ. मयंक चतुर्वेदी भारतीय संस्कृति में प्रकृति को चेतना माना गया है। नदियाँ यहां मां...

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-डॉ. मयंक चतुर्वेदी

भारतीय संस्कृति में प्रकृति को चेतना माना गया है। नदियाँ यहां मां हैं, वृक्ष देवता हैं और जल जीवन का आधार। आधुनिक विकास की अंधी दौड़ में जब पर्यावरण संकट वैश्विक चिंता बनता जा रहा है, तब कुछ व्यक्तित्व ऐसे भी हुए जिन्होंने भारतीय जीवनदृष्टि को आधुनिक पर्यावरणीय चिंताओं से जोड़ने का प्रयास किया। श्रद्धेय अनिल माधव दवे उन्हीं विरले व्यक्तित्वों में से एक थे। उनके लिए पर्यावरण साधना, सेवा और संस्कार का हिस्सा रहा। नर्मदा के तटों से लेकर संयुक्त राष्ट्र की जलवायु वार्ताओं तक, उन्होंने भारतीय चिंतन को मजबूती से रखा।

नर्मदा से जुड़ा आत्मिक रिश्ता

अनिल माधव दवे का नाम लेते ही सबसे पहले नर्मदा का स्मरण होता है। मध्य प्रदेश की जीवनरेखा कही जाने वाली नर्मदा नदी उनके हृदय के अत्यंत निकट थी। उन्होंने नर्मदा को केवल नदी नहीं, बल्कि संस्कृति और सभ्यता की धारा माना।उनके गैर-सरकारी संगठन ‘नर्मदा समग्र’ के माध्यम से उन्होंने नदी संरक्षण के लिए व्यापक अभियान चलाए। नर्मदा किनारे वृक्षारोपण, घाटों की स्वच्छता, जैविक खेती को बढ़ावा और जल संरक्षण जैसे अनेक कार्य उनके नेतृत्व में हुए। उन्होंने दूरस्थ क्षेत्रों तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने के लिए नदी एम्बुलेंस तक शुरू करवाई।

नर्मदा के प्रति उनका समर्पण इतना गहरा था कि उन्होंने सेना विमान से नर्मदा की हवाई परिक्रमा की और फिर पूरी नदी में राफ्टिंग कर उसके भूगोल, समाज और पर्यावरण को करीब से समझा। यह केवल रोमांच नहीं, बल्कि नदी को आत्मा से समझने का प्रयास था।

विचार महाकुंभ: परंपरा और आधुनिकता का संगम

साल 2016 में उज्जैन सिंहस्थ के दौरान आयोजित ‘अंतर्राष्ट्रीय विचार महाकुंभ’ अनिल माधव दवे की दूरदृष्टि का उत्कृष्ट उदाहरण था। ‘जीवन जीने का सही तरीका’ विषय पर आयोजित इस महाआयोजन में संत, विचारक, राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता एक मंच पर आए।इस आयोजन की सबसे बड़ी विशेषता थी भारतीय परंपरा को आधुनिक विमर्श से जोड़ना। दवे मानते थे कि समाज के बड़े प्रश्नों का समाधान राजनीतिक बहसों में नहीं, बल्कि सामूहिक बौद्धिक मंथन से निकलता है। इसी चिंतन से ‘सिंहस्थ की सार्वभौमिक घोषणा’ तैयार हुई, जिसमें पर्यावरण, मानवता और सतत विकास को लेकर 51 सूत्र प्रस्तुत किए गए। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी इस आयोजन की सफलता का श्रेय अनिल माधव दवे जी को दिया था।

भोजन की बर्बादी को भी मानते थे पर्यावरण संकट

अनिल माधव दवे की सोच बड़े मंचों तक सीमित नहीं थी। वे जीवन के छोटे-छोटे व्यवहारों में भी पर्यावरणीय चेतना देखते थे। विचार महाकुंभ के दौरान जब उन्होंने लगभग 200 किलो भोजन बर्बाद होते देखा, तो वे बेहद व्यथित हुए। उन्होंने हाथ जोड़कर लोगों से कहा, “थाली में उतना ही लें जितना खा सकें। इस अनाज को पैदा करने में प्रकृति का कितना योगदान है, यह समझना होगा।” निश्चित ही उनका यह कथन भारतीय जीवनशैली के उस मूल भाव को सामने लाता था जिसमें अन्न, जल और प्रकृति के प्रति सम्मान सर्वोपरि माना गया है।

आरएसएस प्रचारक से पर्यावरण मंत्री तक कीयात्रा

अनिल माधव दवे का सार्वजनिक जीवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रचारक के रूप में शुरू हुआ। संगठनात्मक क्षमता, सरलता और रणनीतिक सोच के कारण उन्होंने राजनीति में भी अपनी विशेष पहचान बनाई। साल 2003 में मध्य प्रदेश की राजनीति में सत्ता परिवर्तन की रणनीति तैयार करने में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका मानी जाती है। बाद में वे राज्यसभा सांसद बने और संसदीय समितियों में सक्रिय भूमिका निभाई। जुलाई 2016 में उन्हें केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्री नियुक्त किया गया।

मंत्री बनने के बाद उनके सामने कई जटिल चुनौतियां थीं, जलवायु परिवर्तन, विकास परियोजनाओं की मंजूरी, वायु प्रदूषण, जैविक विविधता और आनुवंशिक रूप से संशोधित फसलों जैसे विषय। लेकिन उन्होंने हमेशा भारतीय दृष्टिकोण और संतुलन को प्राथमिकता दी।

विचारों में मतभेद, संवाद में नहीं

अनिल माधव दवे की सबसे बड़ी विशेषता थी संवाद की क्षमता। वे वैचारिक मतभेदों को कभी दूरी का कारण नहीं बनने देते थे। गांधीवादी पर्यावरणविद् अनुपम मिश्रा से उनके आत्मीय संबंध इसका उदाहरण हैं। दवे, संघ पृष्ठभूमि से होने के बावजूद, मिश्रा जैसे विचारकों से लगातार सीखते रहे। बीमारी के दौरान वे अस्पताल में घंटों उनके पास बैठे रहते थे। यह उनकी विनम्रता और सीखने की प्रवृत्ति को दर्शाता है।

भारतीय दृष्टि से जलवायु परिवर्तन की वकालत

संयुक्त राष्ट्र की जलवायु परिवर्तन वार्ताओं में अनिल माधव दवे ने भारत की स्थिति को मजबूती से रखा। वे मानते थे कि पर्यावरण संरक्षण की जिम्मेदारी केवल विकासशील देशों पर नहीं डाली जा सकती।उनका स्पष्ट मत था कि प्रकृति के साथ संतुलन भारतीय संस्कृति का हिस्सा रहा है, इसलिए भारत को पर्यावरण के प्रश्न पर पश्चिमी देशों से सीखने की नहीं, बल्कि अपनी परंपराओं को पुनर्जीवित करने की आवश्यकता है।

सादगी में छिपा असाधारण व्यक्तित्व

राजनीति के उच्च पदों पर पहुंचने के बावजूद दवे का जीवन अत्यंत सादा रहा। वे दिखावे और व्यक्तिपूजा से दूर रहते थे। उनकी वसीयत इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। उन्होंने स्पष्ट लिखा कि उनके नाम पर कोई स्मारक या पुरस्कार न बनाया जाए। यदि कोई उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि देना चाहता है, तो वह वृक्ष लगाए, जल स्रोतों का संरक्षण करे और नदियों को बचाने का प्रयास करे। वस्तुतः यह विचार बताता है कि उनके लिए जीवन का उद्देश्य प्रसिद्धि नहीं, बल्कि प्रकृति और समाज की सेवा था।

एक अधूरा लेकिन प्रेरणादायक सफर

18 मई 2017 को हृदयाघात से उनका निधन हो गया। मात्र 61 वर्ष की आयु में उनका जाना देश के लिए बड़ी क्षति थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे “व्यक्तिगत क्षति” बताया था। किंतु अनिल माधव दवे उन दुर्लभ लोगों में थे जिन्होंने राजनीति, अध्यात्म और पर्यावरण को एक सूत्र में पिरोने का प्रयास किया। उन्होंने दिखाया कि विकास और प्रकृति विरोधी नहीं, बल्कि संतुलित दृष्टि से दोनों साथ चल सकते हैं।

आज जब नदियाँ प्रदूषित हैं, जंगल सिमट रहे हैं और जल संकट गहरा रहा है, तब अनिल माधव दवे की सोच पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक लगती है। उनका जीवन हमें यह बार-बार याद दिलाता है कि पर्यावरण की रक्षा कोई सरकारी कार्यक्रम नहीं, यह तो जीवन जीने की संस्कृति है। शत् शत् नमन ।

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फिल्म ‘भूत बंगला’ के विवादित दृश्य को लेकर समाजसेवी रीतेश दुबे ने उठाई आपत्ति, सेंसर बोर्ड व केंद्र सरकार को भेजा आवेदन https://aajkhabar.in/entertainment/social-activist-ritesh-dubey-has-raised-objections-controversial-scene-in-film-bhoot-bangla/ https://aajkhabar.in/entertainment/social-activist-ritesh-dubey-has-raised-objections-controversial-scene-in-film-bhoot-bangla/#respond Mon, 04 May 2026 11:20:13 +0000 https://aajkhabar.in/?p=6913 भोपाल। फिल्म ‘भूत बंगला’ में ज्योतिष विद्या के कथित अपमानजनक चित्रण को लेकर भोपाल निवासी...

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भोपाल। फिल्म ‘भूत बंगला’ में ज्योतिष विद्या के कथित अपमानजनक चित्रण को लेकर भोपाल निवासी समाजसेवी एवं अखिल भारतीय साहित्य परिषद के आजीवन सदस्य रीतेश दुबे ने कड़ी आपत्ति दर्ज कराई है। उन्होंने इस संबंध में एक औपचारिक आवेदन केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सेंसर बोर्ड) के अध्यक्ष, भारत सरकार के सूचना एवं प्रसारण मंत्री तथा संबंधित सचिव को अग्रेषित किया है।

अपने आवेदन में रीतेश दुबे ने उल्लेख किया है कि फिल्म के अंतिम दृश्य में ज्योतिषी पात्र के साथ अभद्र व्यवहार एवं आपत्तिजनक संवाद दर्शाए गए हैं, जो भारतीय ज्ञान परंपरा और ज्योतिष शास्त्र के प्रति असम्मानजनक हैं। उन्होंने इसे समाज में गलत संदेश देने वाला बताते हुए ऐसे दृश्यों को हटाने या संशोधित करने की मांग की है।

दुबे ने कहा कि जब केंद्र सरकार भारतीय ज्ञान परंपरा के संरक्षण और प्रचार-प्रसार के लिए विभिन्न स्तरों पर प्रयास कर रही है, तब इस प्रकार की प्रस्तुतियां सांस्कृतिक मूल्यों को आहत करती हैं। उन्होंने संबंधित अधिकारियों से इस विषय में गंभीरता से विचार कर आवश्यक कार्रवाई करने का अनुरोध किया है।

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अनुसूचित जाति आरक्षण और मतांतरण: संवैधानिक सीमाएँ, न्यायिक दृष्टिकोण https://aajkhabar.in/discussion/scheduled-caste-reservation-and-religious-conversion-constitutional-limits-judicial-perspectives/ https://aajkhabar.in/discussion/scheduled-caste-reservation-and-religious-conversion-constitutional-limits-judicial-perspectives/#respond Tue, 28 Apr 2026 09:17:57 +0000 https://aajkhabar.in/?p=6908 -कैलाश चन्द्र भारत का संवैधानिक ढाँचा अनुसूचित जातियों (एससी) को उन ऐतिहासिक सामाजिक विषमताओं से...

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-कैलाश चन्द्र

भारत का संवैधानिक ढाँचा अनुसूचित जातियों (एससी) को उन ऐतिहासिक सामाजिक विषमताओं से उबारने के लिए विशेष संरक्षण और आरक्षण प्रदान करता है, जो सदियों से चले आ रहे अस्पृश्यता, बहिष्कार और जातिगत उत्पीड़न से उत्पन्न हुई हैं। यह व्यवस्था केवल आर्थिक पिछड़ेपन का समाधान नहीं है बल्कि एक गहरे सामाजिक अन्याय के प्रतिकार के रूप में विकसित की गई है। इसी कारण अनुसूचित जाति का दर्जा मूलतः उस सामाजिक-धार्मिक संरचना से जुड़ा माना गया है, जिसमें यह उत्पीड़न उत्पन्न हुआ अर्थात पारंपरिक हिंदू सामाजिक व्यवस्था।

संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 के अनुसार एससी का दर्जा प्रारंभ में केवल हिंदुओं तक सीमित था, जिसे बाद में संशोधनों के माध्यम से सिख (1956) और बौद्ध (1990) समुदायों तक विस्तारित किया गया। इस व्यवस्था के अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति, जो मूलतः एससी समुदाय से आता है, इस्लाम या ईसाई धर्म अपना लेता है तो वह एससी के लिए उपलब्ध आरक्षण और विशेषाधिकारों का दावा नहीं कर सकता। इस सिद्धांत के पीछे यह धारणा है कि इन धर्मों में वह संरचित जाति-आधारित अस्पृश्यता नहीं है, जिसके निवारण हेतु एससी आरक्षण की व्यवस्था की गई थी।

समस्या तब जटिल हो जाती है जब धर्म परिवर्तन के बाद भी कोई व्यक्ति एससी आरक्षण का लाभ लेना जारी रखता है या अपनी धार्मिक पहचान को अस्पष्ट रखकर संवैधानिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास करता है। ऐसी स्थिति न केवल संविधान की मूल भावना को आहत करती है बल्कि वास्तविक वंचित वर्गों के अधिकारों का हनन भी करती है। न्यायपालिका ने इस विषय पर अनेक बार स्पष्ट किया है कि धर्म परिवर्तन से सामाजिक पहचान का प्रश्न पूरी तरह समाप्त नहीं होता, किंतु एससी आरक्षण का अधिकार समाप्त हो जाता है, जब तक यह प्रमाणित न हो कि नए धर्म में भी व्यक्ति समान सामाजिक उत्पीड़न का सामना कर रहा है।

इस जटिल प्रश्न को समझने के लिए पश्चिम बंगाल की एक चर्चित राजनीतिक घटना अपरूपा पोद्दार उर्फ़ आफरीन अली का प्रकरण महत्वपूर्ण केस स्टडी प्रस्तुत करता है। अपरूपा पोद्दार का जन्म एक हिंदू अनुसूचित जाति परिवार में हुआ था। वर्ष 2007 में उन्होंने रिशड़ा क्षेत्र के स्थानीय पार्षद मोहम्मद शाकिर अली से विवाह किया। कुछ मीडिया रिपोर्टों में यह दावा किया गया कि विवाह के बाद उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर “आफरीन अली” नाम धारण किया, जबकि उन्होंने स्वयं सार्वजनिक रूप से कहा कि उन्होंने केवल नाम बदला है, धर्म नहीं।

विवाद तब गहराया जब 2014 के लोकसभा चुनाव में उन्हें आरामबाग (एससी आरक्षित सीट) से उम्मीदवार बनाया गया। विपक्षी दलों ने आपत्ति उठाई कि यदि उन्होंने धर्म परिवर्तन किया है तो एससी आरक्षित सीट से चुनाव लड़ना संवैधानिक रूप से अनुचित है। उन्होंने नामांकन में “Aparoopa Poddar @ Afrin Ali” का प्रयोग किया और चुनाव जीत भी गईं। हालांकि धर्म परिवर्तन का कोई आधिकारिक प्रमाण न्यायालय या चुनाव आयोग के समक्ष प्रस्तुत नहीं किया गया, जिसके कारण उनकी उम्मीदवारी रद्द नहीं की गई।

यहाँ एक महत्वपूर्ण पहलू इस्लामी कानून से जुड़ा है। पारंपरिक इस्लामी शरीअत के अनुसार किसी मुस्लिम पुरुष का विवाह (निकाह) एक गैर-मुस्लिम महिला (जो ‘अहल-ए-किताब’ श्रेणी में न आती हो) से वैध नहीं माना जाता, जब तक कि वह महिला इस्लाम स्वीकार न कर ले। इस आधार पर यह प्रश्न उठता है कि यदि वास्तव में निकाह हुआ था तो क्या धर्म परिवर्तन भी हुआ होगा। किंतु चूँकि इसका कोई विधिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है इसलिए यह विवाद अनिर्णीत ही रहा।

भारतीय न्यायपालिका ने इस विषय पर कई महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं। Soosai बनाम Union of India (1985) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि ईसाई धर्म अपनाने वाला व्यक्ति एससी का दावा नहीं कर सकता। सीएम अरुमुगम (1976) और कैलाश सोनकर (1984) जैसे मामलों में यह सिद्धांत स्थापित हुआ कि यदि कोई व्यक्ति पुनः हिंदू धर्म में लौटता है और उसका समुदाय उसे स्वीकार कर लेता है तो उसका एससी दर्जा पुनर्जीवित हो सकता है। वहीं पुनीत राय (2003) और मो. सादिक (2016) में यह स्पष्ट किया गया कि इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाने के बाद एससी आरक्षण का दावा नहीं किया जा सकता।

इन सभी निर्णयों से एक व्यापक सिद्धांत उभरता है कि एससी आरक्षण केवल जातिगत उत्पीड़न की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि से जुड़ा है, न कि मात्र जन्म या पहचान से। धर्म परिवर्तन इस अधिकार को प्रभावित करता है क्योंकि यह उस सामाजिक संरचना से दूरी को दर्शाता है, जिसमें यह उत्पीड़न निहित था।

अंततः यह प्रश्न केवल कानूनी नहीं बल्कि नैतिक और सामाजिक भी है। यदि आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य वास्तविक वंचित समुदायों को न्याय दिलाना है तो इसका उपयोग केवल उन्हीं तक सीमित रहना चाहिए। धर्मांतरण और एससी आरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करना संवेदनशील प्रक्रिया है, जिसमें तथ्यों की पारदर्शिता, न्यायिक विवेक और संवैधानिक मूल्यों का सम्मान अनिवार्य है।

इस प्रकार “एससी आरक्षण और धर्मांतरण” का विषय भारतीय लोकतंत्र के लिए महत्वपूर्ण परीक्षण है, जहाँ न्याय, समानता और ऐतिहासिक सत्य के बीच संतुलन स्थापित करना ही सबसे बड़ी चुनौती है।

(लेखक, स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।)

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नीरव मोदी प्रत्यर्पण केस में बड़ा अपडेट: लंदन में CBI की सक्रियता तेज, भारत वापसी के संकेत https://aajkhabar.in/international/major-update-in-nirav-modi-extradition-case-cbi-intensifies-activity-in-london-hints-at-return-to-india/ https://aajkhabar.in/international/major-update-in-nirav-modi-extradition-case-cbi-intensifies-activity-in-london-hints-at-return-to-india/#respond Wed, 15 Apr 2026 10:32:00 +0000 https://aajkhabar.in/international/major-update-in-nirav-modi-extradition-case-cbi-intensifies-activity-in-london-hints-at-return-to-india/ नई दिल्ली। भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी को भारत लाने की प्रक्रिया अब निर्णायक चरण...

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नई दिल्ली।
भगोड़े हीरा कारोबारी नीरव मोदी को भारत लाने की प्रक्रिया अब निर्णायक चरण में पहुंचती नजर आ रही है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक, प्रत्यर्पण से जुड़ी अधिकांश कानूनी बाधाएं दूर हो चुकी हैं और इसी के चलते केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) की टीमें इन दिनों लंदन में सक्रिय हैं।

लंदन में CBI की मौजूदगी क्यों अहम?

सूत्रों का कहना है कि लंदन में जांच एजेंसियों की बढ़ती गतिविधि इस बात का संकेत है कि प्रत्यर्पण प्रक्रिया अंतिम दौर में है। जैसे ही शेष औपचारिकताएं पूरी होंगी, नीरव मोदी को भारत लाने की कार्रवाई शुरू की जा सकती है। इसे भारत सरकार के लिए बड़ी कानूनी और कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जा रहा है।

क्या है पूरा मामला?

नीरव मोदी पर अपने मामा मेहुल चोकसी के साथ मिलकर पंजाब नेशनल बैंक (PNB) में करीब 13,000 करोड़ रुपये के घोटाले का आरोप है। CBI के अनुसार, इस घोटाले में लगभग 6,498 करोड़ रुपये की धोखाधड़ी सीधे तौर पर नीरव मोदी से जुड़ी बताई गई है।

कब से जेल में है मोदी?

55 वर्षीय नीरव मोदी को 19 मार्च 2019 को ब्रिटेन में गिरफ्तार किया गया था। तब से वह वैंड्सवर्थ जेल, लंदन में बंद है। कभी लग्जरी ज्वेलरी ब्रांड और ग्लैमरस आयोजनों में चर्चा में रहने वाला यह कारोबारी अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित आर्थिक अपराधी बन चुका है।

कानूनी रास्ते लगभग खत्म

हाल ही में ब्रिटेन की हाई कोर्ट ऑफ जस्टिस ने नीरव मोदी की प्रत्यर्पण के खिलाफ अपील को फिर से खोलने की मांग खारिज कर दी थी। इसके बाद उसके पास सीमित कानूनी विकल्प बचे हैं। हालांकि उसने यूरोपीय मानवाधिकार न्यायालय का रुख किया है, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे प्रक्रिया में ज्यादा देरी की संभावना नहीं है।

कब हो सकता है प्रत्यर्पण?

आधिकारिक तौर पर अभी कोई तारीख तय नहीं की गई है, लेकिन हालिया घटनाक्रमों को देखते हुए माना जा रहा है कि प्रत्यर्पण की प्रक्रिया जल्द पूरी हो सकती है।

नीरव मोदी का भारत प्रत्यर्पण अब औपचारिकताओं तक सीमित माना जा रहा है। यदि यह जल्द होता है, तो यह न केवल आर्थिक अपराधियों के खिलाफ बड़ी कार्रवाई होगी, बल्कि भविष्य के मामलों के लिए भी सख्त संदेश साबित होगा।

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सुप्रीम कोर्ट सख्त: पवन खेड़ा की ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर रोक, तीन हफ्ते में जवाब तलब https://aajkhabar.in/national/supreme-court-strict-pawan-kheras-transit-anticipatory-bail-stayed-seeks-reply-within-three-weeks/ https://aajkhabar.in/national/supreme-court-strict-pawan-kheras-transit-anticipatory-bail-stayed-seeks-reply-within-three-weeks/#respond Wed, 15 Apr 2026 10:27:00 +0000 https://aajkhabar.in/national/supreme-court-strict-pawan-kheras-transit-anticipatory-bail-stayed-seeks-reply-within-three-weeks/ नई दिल्ली। पवन खेड़ा को तेलंगाना हाई कोर्ट से मिली ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर सुप्रीम...

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नई दिल्ली।
पवन खेड़ा को तेलंगाना हाई कोर्ट से मिली ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। शीर्ष अदालत ने कांग्रेस नेता को नोटिस जारी करते हुए तीन सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं।

न्यायमूर्ति जे.के. माहेश्वरी और अतुल एस. चंदुरकर की पीठ ने यह आदेश असम सरकार की याचिका पर सुनवाई के दौरान दिया। याचिका में तेलंगाना हाई कोर्ट द्वारा दी गई एक सप्ताह की ट्रांजिट बेल को चुनौती दी गई थी।

कोर्ट का स्पष्ट निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि फिलहाल ट्रांजिट अग्रिम जमानत पर रोक रहेगी। हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि पवन खेड़ा असम की सक्षम अदालत में अग्रिम जमानत के लिए आवेदन करते हैं, तो इस आदेश से उस प्रक्रिया पर कोई असर नहीं पड़ेगा। मामले की अगली सुनवाई तीन सप्ताह बाद तय की गई है।

असम सरकार की दलील

सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलील दी कि इस मामले में तेलंगाना हाई कोर्ट को सुनवाई का अधिकार क्षेत्र नहीं था, क्योंकि एफआईआर और कथित अपराध दोनों असम में दर्ज हुए हैं। उन्होंने इसे ‘फोरम शॉपिंग’ बताते हुए कानून के दुरुपयोग का आरोप लगाया।

क्या है पूरा मामला

यह विवाद हिमंत बिस्वा सरमा की पत्नी रिनिकी भूयान सरमा को लेकर कथित आपत्तिजनक टिप्पणियों से जुड़ा है। असम पुलिस ने पवन खेड़ा के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS) की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया है, जिनमें मानहानि, जालसाजी और आपराधिक साजिश के आरोप शामिल हैं।

खेड़ा का पक्ष

खेड़ा की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने दलील दी कि मामला राजनीतिक द्वेष से प्रेरित है और अधिकतम मानहानि का मामला बनता है, जिसमें गिरफ्तारी आवश्यक नहीं है।

पहले क्या हुआ था

तेलंगाना हाई कोर्ट की एकल पीठ ने 10 अप्रैल को खेड़ा को एक सप्ताह की ट्रांजिट अग्रिम जमानत दी थी, ताकि वे संबंधित अदालत में नियमित जमानत के लिए आवेदन कर सकें। इसी आदेश को चुनौती देते हुए असम सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी।

राजनीतिक माहौल गर्म

इस मामले ने राज्य की सियासत को भी गरमा दिया है। कांग्रेस ने इसे राजनीतिक प्रतिशोध बताया है, जबकि बीजेपी ने खेड़ा के बयान को गैरजिम्मेदार और मानहानिकारक करार दिया है।

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कलेक्ट्रेट में फर्जीवाड़ा सरकारी बाबुओं और दलाल की मिलीभगत से जमीन बेचने की साजिश https://aajkhabar.in/madhya-pradesh/fraud-at-the-collectorate-a-conspiracy-to-sell-land-through-collusion-between-government-officials-and-middlem/ https://aajkhabar.in/madhya-pradesh/fraud-at-the-collectorate-a-conspiracy-to-sell-land-through-collusion-between-government-officials-and-middlem/#respond Wed, 15 Apr 2026 10:22:00 +0000 https://aajkhabar.in/madhya-pradesh/fraud-at-the-collectorate-a-conspiracy-to-sell-land-through-collusion-between-government-officials-and-middlem/ देवास । मध्यप्रदेश के देवास जिले में प्रशासनिक तंत्र को झकझोर देने वाला एक बड़ा...

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देवास । मध्यप्रदेश के देवास जिले में प्रशासनिक तंत्र को झकझोर देने वाला एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है जिसमें कलेक्टर के नाम से फर्जी हस्ताक्षर और आदेश जारी कर जमीन बेचने की साजिश रची गई। इस मामले ने न केवल सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े किए हैं बल्कि आम जनता में भी आक्रोश पैदा कर दिया है।

जानकारी के अनुसार कलेक्ट्रेट कार्यालय से जुड़े इस मामले में सरकारी कर्मचारियों और एक दलाल की मिलीभगत सामने आई है। कलेक्टर ऋतुराज सिंह को जब इस गड़बड़ी की जानकारी मिली तो उन्होंने तत्काल BNP थाना पुलिस को शिकायत दर्ज कराई। जांच के बाद पुलिस ने धोखाधड़ी और सरकारी दस्तावेजों में कूट रचना जैसी गंभीर धाराओं में मामला दर्ज किया।

पुलिस ने कार्रवाई करते हुए नजूल शाखा के बाबू रमेश लोबानिया अपर कलेक्टर कार्यालय के बाबू संजय जाटव विजयागंज मंडी तहसील के बाबू जितेंद्र भद्रे और एक दलाल को गिरफ्तार कर लिया है। शहर के CSP सुमित अग्रवाल ने बताया कि आरोपियों ने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए फर्जी दस्तावेज तैयार किए और उन्हें वैध दिखाकर जमीन बेचने की कोशिश की।

जांच में सामने आया है कि आरोपियों ने सरकारी प्रक्रिया को दरकिनार कर कलेक्टर के नाम से फर्जी आदेश जारी किए। इन दस्तावेजों का इस्तेमाल कर छोटे और कमजोर वर्ग के लोगों की जमीन को बेचने का प्रयास किया गया। इतना ही नहीं एक किसान की जमीन की रजिस्ट्री भी करवा दी गई थी जिसे बाद में निरस्त कराया गया। इस पूरे मामले में दलाल की भूमिका भी बेहद अहम मानी जा रही है जिसने खरीदार और सरकारी कर्मचारियों के बीच कड़ी का काम किया। आरोप है कि पैसों के लालच में यह पूरा फर्जीवाड़ा अंजाम दिया गया।

यह मामला केवल फर्जी दस्तावेज बनाने तक सीमित नहीं है बल्कि यह एक सुनियोजित साजिश प्रतीत हो रही है जिसमें अंदरूनी कर्मचारियों ने सिस्टम की कमजोरियों का फायदा उठाया। अब यह जांच का विषय है कि क्या इस पूरे प्रकरण में वरिष्ठ अधिकारियों को जानकारी थी या उन्हें पूरी तरह अंधेरे में रखा गया।

फिलहाल पुलिस पूरे मामले की गहन जांच कर रही है और संभावना जताई जा रही है कि आने वाले दिनों में इस घोटाले से जुड़े और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं। यह घटना एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर करती है कि यदि सरकारी दफ्तरों से ही फर्जी आदेश जारी होने लगें तो आम जनता का भरोसा व्यवस्था पर कैसे कायम रहेगा।

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ईरान-अमेरिका तनाव का असर: सोना-चांदी की कीमतों में लगातार दूसरे दिन तेजी https://aajkhabar.in/international/iran-us-tensions-impact-gold-and-silver-prices-rise-for-the-second-consecutive-day/ https://aajkhabar.in/international/iran-us-tensions-impact-gold-and-silver-prices-rise-for-the-second-consecutive-day/#respond Wed, 15 Apr 2026 10:21:00 +0000 https://aajkhabar.in/international/iran-us-tensions-impact-gold-and-silver-prices-rise-for-the-second-consecutive-day/ नई दिल्ली। सोने और चांदी की कीमतों में आज लगातार दूसरे दिन तेजी देखने को मिली...

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नई दिल्ली।
 सोने और चांदी की कीमतों में आज लगातार दूसरे दिन तेजी देखने को मिली है। अमेरिका और ईरान के बीच फिर से बातचीत की संभावनाओं की वजह से आज इंटरनेशनल मार्केट गोल्ड और सिल्वर का रेट फिर से बढ़ा हुआ है। मौजूदा परिस्थितियों की वजह से दुनिया भर में एनर्जी संकट गहरा गया है। बता दें, पाकिस्तान में ईरान और अमेरिका के बीच एक दौर की बातचीत हो गई है। लेकिन यह पूरी वार्ता विफल रही थी। दोनों पक्षों के बीच कोई समझौता तब नहीं हो पाया था।

क्या है गोल्ड का ताजा रेट (Gold Latest Price)
COMEX gold की कीमतों में आज शुरुआती कारोबार के दौरान बढ़ोतरी देखने को मिली। जिसके बाद यह 4855 डॉलर प्रति आउंस के स्तर पर पहुंच गया। इससे पहले के सत्र में सोने का भाव 2 प्रतिशत से अधिक बढ़ा था। COMEX Silver के रेट भी आज बुधवार को बढ़ोतरी देखने को मिली है। चांदी की कीमतों में उछाल के बाद यह 79 डॉलर प्रति आउंस के स्तर पर पहुंच गई थी।

  • ब्लूमबर्ग के अनुसार अमेरिका और ईरान के बीच दूसरे दौर की बातचीत आने वाले दिनों में हो सकती है। न्यूयार्क पोस्ट की रिपोर्ट के अनुसार अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने अगले दो दिनों में बातचीत शुरू होने के संकेत दिए हैं। इन खबरों की वजह से मंगलवार को अमेरिकी शेयर बाजार में तेजी दर्ज की गई। वहीं, डॉलर इंडेक्स 0.3 प्रतिशत लुढ़क चुका है। बता दें, जब से युद्ध शुरू हुआ है तब से मेटल की कीमतों में 8 प्रतिशत की गिरावट देखने को मिली है।

    कहां तक जाएगा सोने और चांदी का रेट (Gold Silver Price Outlook)
    Augmon से जुड़ी रेनिशा कहती हैं कि सोने और चांदी इस समय भी बुल रन पर सवार हैं। हालांकि, आगे का रास्ता काफी अनिश्चितताओं से भरा हुआ है। रेनिशा का कहना है टेक्निकल स्तर पर, “गोल्ड 4800 से 4850 डॉलर (154000 रुपये से 155000 रुपये तक) के आस-पास रेसिस्टेंस दिखा रहा है। अगर कीमतें इसके ऊपर गई तो यह फिर 5000 डॉलर (160000 रुपये) के स्तर तक जा सकती हैं।”

    चांदी के विषय में एक्सपर्ट की राय है कि यह 77 डॉलर (246000 रुपये) के स्तर पर रेसिस्टेंस दिखा रहा है। इसके ऊपर जाने की स्थिति में चांदी का दाम 82 डॉलर से 87 डॉलर (255000 रुपये से 265000 रुपये) के स्तर तक पहुंच सकता है।”

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    ईरान-अमेरिका तनाव के बीच फ्रांस की सक्रिय कूटनीति, क्या मैक्रों दिला पाएंगे राहत? https://aajkhabar.in/international/frances-active-diplomacy-amid-iran-us-tensions-will-macron-be-able-to-provide-relief/ https://aajkhabar.in/international/frances-active-diplomacy-amid-iran-us-tensions-will-macron-be-able-to-provide-relief/#respond Wed, 15 Apr 2026 10:14:00 +0000 https://aajkhabar.in/international/frances-active-diplomacy-amid-iran-us-tensions-will-macron-be-able-to-provide-relief/ वाशिंगटन। मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अब इमैनुएल मैक्रों ने शांति बहाली की...

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    वाशिंगटन
    । मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अब इमैनुएल मैक्रों ने शांति बहाली की दिशा में सक्रिय भूमिका निभानी शुरू कर दी है। फ्रांस के राष्ट्रपति मैक्रों ने हाल ही में डोनाल्ड ट्रंप और मसूद पेजेश्कियन से अलग-अलग बातचीत कर गतिरोध तोड़ने की कोशिश की है।

    होर्मुज स्ट्रेट बना तनाव का केंद्र

    होर्मुज जलडमरूमध्य में बनी तनावपूर्ण स्थिति इस पूरे विवाद की मुख्य वजह है। अमेरिका द्वारा यहां नौसैनिक नाकाबंदी लगाए जाने के बाद हालात और बिगड़ गए हैं। इस बीच ईरान ने संकेत दिया है कि वह बातचीत के लिए तैयार है, लेकिन शर्त यह है कि चर्चा अंतरराष्ट्रीय कानून के दायरे में हो।

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  • ईरान की शर्तें और रुख

    ईरान ने स्पष्ट किया है कि किसी भी पूर्ण युद्धविराम के लिए लेबनान में जारी शत्रुता को खत्म करना जरूरी होगा। तेहरान का मानना है कि यूरोप, खासकर फ्रांस, इस गतिरोध को खत्म करने में अहम भूमिका निभा सकता है। हालांकि इस्लामाबाद में हालिया वार्ता बेनतीजा रही, लेकिन ईरान ने आगे बातचीत जारी रखने की इच्छा जताई है।

    मैक्रों का शांति फॉर्मूला

    मैक्रों ने दोनों नेताओं से बातचीत के बाद तीन अहम प्रस्ताव सामने रखे—

    क्षेत्रीय स्थिरता के लिए युद्धविराम का विस्तार, जिसमें लेबनान को भी शामिल किया जाए
    होर्मुज जलडमरूमध्य को बिना किसी शर्त और शुल्क के तुरंत खोला जाए
    फ्रांस और ब्रिटेन के नेतृत्व में बहुपक्षीय मिशन बनाकर नौवहन की स्वतंत्रता सुनिश्चित की जाए

    फ्रांस और ब्रिटेन इस मुद्दे पर पेरिस में एक वीडियो कॉन्फ्रेंस की मेजबानी भी करने जा रहे हैं, जिसमें अंतरराष्ट्रीय सहयोग पर चर्चा होगी।

    ट्रंप का दावा—ईरान बातचीत को तैयार

    डोनाल्ड ट्रंप ने भी हाल ही में दावा किया कि ईरान की ओर से बातचीत के संकेत मिले हैं और तेहरान समझौता करने को इच्छुक है। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका का रुख सख्त बना रहेगा।

    क्या संभव है समाधान?

    विशेषज्ञों के मुताबिक, हालात बेहद संवेदनशील हैं और किसी भी छोटी चूक से बड़ा संघर्ष हो सकता है। ऐसे में फ्रांस की मध्यस्थता अहम साबित हो सकती है, लेकिन अंतिम समाधान दोनों पक्षों की राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करेगा।

    मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच फ्रांस की पहल एक उम्मीद जरूर जगाती है, लेकिन शांति की राह अभी भी आसान नहीं दिख रही। आने वाले दिनों में यह साफ होगा कि कूटनीति जीतती है या टकराव और गहराता है।

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    राघव चड्ढा को केंद्र से मिली Z सिक्योरिटी, पंजाब सरकार ने छीन ली थी सुरक्षा https://aajkhabar.in/national/raghav-chadha-receives-z-security-from-the-centre-punjab-government-had-withdrawn-his-protection/ https://aajkhabar.in/national/raghav-chadha-receives-z-security-from-the-centre-punjab-government-had-withdrawn-his-protection/#respond Wed, 15 Apr 2026 10:12:00 +0000 https://aajkhabar.in/national/raghav-chadha-receives-z-security-from-the-centre-punjab-government-had-withdrawn-his-protection/ नई दिल्ली । आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा को केंद्र सरकार ने Z...

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    नई दिल्ली । आम आदमी पार्टी के नेता राघव चड्ढा को केंद्र सरकार ने Z श्रेणी की सुरक्षा मुहैया कराई है। इससे पहले पंजाब की AAP सरकार उनकी सुरक्षा वापस ले चुकी थी। सूत्रों के अनुसार खुफिया एजेंसी की थ्रेट परसेप्शन रिपोर्ट के आधार पर गृह मंत्रालय ने यह निर्णय लिया है। नई व्यवस्था के तहत दिल्ली और पंजाब में राघव चड्ढा को Z सिक्योरिटी मिलेगी जबकि अन्य स्थानों पर उन्हें Y प्लस सुरक्षा प्रदान की जाएगी।

    पार्टी में बदली जिम्मेदारियां
    हाल ही में आम आदमी पार्टी ने राघव चड्ढा को राज्यसभा में पार्टी के उपनेता पद से हटा दिया था। उनकी जगह अशोक मित्तल को यह जिम्मेदारी सौंपी गई। साथ ही सदन में उनके बोलने पर भी रोक लगा दी गई थी। इसी बीच प्रवर्तन निदेशालय ED ने अशोक मित्तल के जालंधर स्थित आवास और उनकी निजी यूनिवर्सिटी में छापेमारी भी की है।

    खामोश किया जा सकता है हराया नहीं
    पार्टी से मतभेद बढ़ने के बाद राघव चड्ढा ने खुलकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि उन्हें बोलने से रोका जा सकता है लेकिन हराया नहीं जा सकता। उन्होंने पार्टी की ओर से लगाए जा रहे आरोपों का जवाब वीडियो जारी कर दिया।
    AAP नेतृत्व से बढ़ी दूरी
    पंजाब में AAP सरकार बनने के बाद 2022 में राघव चड्ढा को सुरक्षा दी गई थी जो लगातार जारी रही। लेकिन अरविंद केजरीवाल मनीष सिसोदिया और संजय सिंह जैसे नेताओं के जेल जाने पर उनकी चुप्पी पार्टी नेतृत्व को खली। हालांकि उस समय यह कहा गया कि वे आंखों के इलाज के लिए विदेश गए हुए थे। बाद में जब पार्टी के बड़े नेता जेल से बाहर आए तब भी उनकी सक्रियता कम दिखाई दी। इसके बाद उन्हें राज्यसभा में पद से हटाया गया और अब उनकी सुरक्षा भी वापस ले ली गई थी।

    Z सिक्योरिटी में कैसा होता है सुरक्षा घेरा
    Z श्रेणी की सुरक्षा देश में उच्च स्तर की सुरक्षा मानी जाती है। इसमें लगभग 22 सुरक्षाकर्मी तैनात किए जाते हैं जिनमें 4 से 6 NSG कमांडो शामिल होते हैं। इसके अलावा दिल्ली पुलिस ITBP CRPF और स्थानीय पुलिस के जवान भी इस सुरक्षा घेरे का हिस्सा होते हैं।

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