August 3, 2026

धरती पर हर 2.7 करोड़ साल में दोहराता है महाविनाश का चक्र? नई स्टडी में वैज्ञानिकों का दावा

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नई दिल्ली।
क्या पृथ्वी पर बड़े पैमाने पर होने वाली प्राकृतिक तबाही किसी निश्चित चक्र का हिस्सा है? हाल ही में प्रकाशित एक वैज्ञानिक अध्ययन में ऐसा दावा किया गया है। न्यूयॉर्क यूनिवर्सिटी के भूवैज्ञानिक माइकल रैम्पिनो के नेतृत्व में किए गए शोध के अनुसार, पृथ्वी पर लगभग हर 2.7 करोड़ वर्ष में बड़े भू-वैज्ञानिक और जैविक परिवर्तन देखने को मिलते हैं, जिनमें व्यापक ज्वालामुखीय गतिविधियां, समुद्र में ऑक्सीजन की कमी और जीवों का सामूहिक विलुप्त होना शामिल है।

‘इवॉल्विंग अर्थ’ (Evolving Earth) जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन में कहा गया है कि पृथ्वी के पिछले लगभग 26 करोड़ वर्षों के भूवैज्ञानिक रिकॉर्ड का विश्लेषण करने पर कई विनाशकारी घटनाओं में एक नियमित समय-चक्र दिखाई देता है। हालांकि शोधकर्ताओं ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस संबंध में अभी और अध्ययन की आवश्यकता है।

89 प्रमुख घटनाओं का किया गया विश्लेषण

शोध में पिछले 26 करोड़ वर्षों के दौरान हुई 89 प्रमुख भूवैज्ञानिक और जैविक घटनाओं का अध्ययन किया गया। इनमें समुद्री जीवों का सामूहिक विलुप्त होना, महासागरों में ऑक्सीजन की भारी कमी (ओशनिक एनोक्सिक इवेंट), विशाल ज्वालामुखीय विस्फोट, समुद्र के स्तर में बड़े बदलाव, टेक्टोनिक प्लेटों की गतिविधियां और पृथ्वी की सतह पर अन्य महत्वपूर्ण परिवर्तन शामिल हैं।

विश्लेषण में लगभग 2.7 करोड़ वर्ष का एक प्रमुख चक्र तथा करीब 89 लाख वर्ष का अपेक्षाकृत कमजोर चक्र भी सामने आने का दावा किया गया है।

पृथ्वी के भीतर की गतिविधियां हो सकती हैं कारण

शोधकर्ताओं का मानना है कि इन घटनाओं के पीछे पृथ्वी के मेंटल (Mantle) में होने वाली धीमी लेकिन दीर्घकालिक गतिविधियां महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। मेंटल में होने वाले संवहन (Convection), मेंटल प्लूम का सक्रिय होना और टेक्टोनिक प्लेटों की गति बड़े ज्वालामुखीय विस्फोटों, पर्वत निर्माण और अन्य भूवैज्ञानिक परिवर्तनों को प्रभावित कर सकती है।

अध्ययन में कहा गया है कि पृथ्वी के भीतर होने वाले ये परिवर्तन जलवायु, महासागरों और सतह पर मौजूद जीवन पर भी व्यापक प्रभाव डाल सकते हैं।

अंतरिक्षीय कारकों पर भी जताई संभावना

अध्ययन में यह संभावना भी व्यक्त की गई है कि पृथ्वी के बाहर मौजूद कुछ खगोलीय कारक भी इस चक्र से जुड़े हो सकते हैं। शोधकर्ताओं के अनुसार, सौरमंडल जब मिल्की वे आकाशगंगा के विभिन्न क्षेत्रों से होकर गुजरता है, तब गुरुत्वाकर्षण संबंधी प्रभाव धूमकेतुओं या क्षुद्रग्रहों की गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं। कुछ वैज्ञानिकों ने डार्क मैटर की संभावित भूमिका पर भी विचार व्यक्त किया है, हालांकि इन परिकल्पनाओं की अभी पुष्टि नहीं हुई है।

अभी निर्णायक निष्कर्ष नहीं

शोधकर्ता माइकल रैम्पिनो ने कहा है कि यह अध्ययन किसी अंतिम निष्कर्ष पर नहीं पहुंचता, बल्कि एक संभावित पैटर्न की ओर संकेत करता है। उन्होंने माना कि करोड़ों वर्ष पुराने भूवैज्ञानिक अभिलेख पूर्ण नहीं हैं और कई घटनाओं की सटीक समय-सीमा निर्धारित करना चुनौतीपूर्ण है।

शोध के अनुसार, यदि भविष्य के अध्ययन इस चक्र की पुष्टि करते हैं, तो इससे पृथ्वी की भूवैज्ञानिक प्रक्रियाओं और ब्रह्मांडीय प्रभावों के बीच संबंधों को समझने में महत्वपूर्ण प्रगति हो सकती है। फिलहाल वैज्ञानिक समुदाय इस विषय पर आगे के अनुसंधानों और अतिरिक्त प्रमाणों का इंतजार कर रहा है।

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