March 17, 2026

बुंदेलखंड के लोक-हृदय में रचे-बसे प्रभु श्रीराम, कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय में राष्ट्रीय संगोष्ठी

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सागर। पंडित दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य अग्रणी महाविद्यालय, सागर में ‘बुंदेलखंड के लोक-हृदय में श्रीराम’ विषय पर सोमवार को आयोजित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का गरिमामय शुभारंभ हुआ। रानी अवंतीबाई लोधी विश्वविद्यालय के कुलगुरू डॉ. विनोद मिश्र की अध्यक्षता में आयोजित इस कार्यक्रम में देश-दुनिया के प्रख्यात विद्वानों ने श्रीराम के लोक-व्यापी स्वरूप और बुंदेलखंड की संस्कृति में उनके गहरे प्रभाव पर गहन मंथन किया।
प्राचार्य का संबोधन और वैचारिक आधार
संगोष्ठी की संरक्षक एवं प्राचार्य डॉ. सरोज गुप्ता ने अपने स्वागत उद्बोधन में कहा कि श्रीराम केवल एक नाम मात्र नहीं, बल्कि नर और नारायण के साक्षात् रूप हैं। उन्होंने भारत को ऋषि-मुनियों की धरा बताते हुए कहा कि श्रीराम का जीवन एक विशाल वटवृक्ष की भांति है, जिसकी छाया में संपूर्ण मानवता पल्लवित होती है। डॉ. गुप्ता ने रेखांकित किया कि बुंदेलखंड में रामलीलाओं के मंचन के माध्यम से रामकथा हर वर्ष जीवंत होती है और यहाँ की लोक-कथाओं व गीतों में राम पूरी तरह रचे-बसे हैं।

अध्यक्षीय उद्बोधन में डॉ. विनोद मिश्र ने कहा कि पिछले 500 वर्षों से भले ही कई लोगों ने राम की सत्यता को विवादास्पद बनाने की कोशिश की, लेकिन लोक मानस में उनकी जड़ें अत्यंत गहरी हैं। उन्होंने हिंदी और बुंदेली कवियों के योगदान को सराहते हुए कहा कि इन साहित्यकारों ने राम के आदर्शों और सौंदर्य को आधार बनाकर कालजयी साहित्य की रचना की है।

सत्र में आशीर्वचन देते हुए महंत केशव गिरि जी महाराज ने श्रीराम को अखंड ब्रह्मांड के कण-कण का प्राण बताया। उन्होंने युवाओं को संदेश दिया कि माता-पिता की सेवा ही सच्ची भक्ति है और अभिभावकों की जिम्मेदारी है कि वे नई पीढ़ी को कुसंग और नशे से बचाकर सन्मार्ग पर ले जाएं।

कार्यक्रम में डॉ. नीरज दुबे ने महाविद्यालय के शोधपरक वातावरण की प्रशंसा करते हुए कहा कि शिक्षा से अधिक संस्कार की आवश्यकता है। वहीं डॉ. शक्ति जैन ने जैन पद्मपुराण में वर्णित श्रीराम की कथा का उल्लेख करते हुए उनके आदर्शों की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला।

मुख्य वक्ता के रूप में प्रख्यात विद्वान पं. श्यामसुंदर दुबे ने अपने बीज वक्तव्य में ‘लोक स्मृति’ और ‘लोक उपाख्यान’ पर चर्चा की। उन्होंने कहा कि लोक स्मृति इतिहास निर्माण में सहायक होती है। जहाँ वाल्मीकि ने रामायण में लोक स्मृतियों के माध्यम से रामचरित का संकेंद्रण किया, वहीं तुलसीदास ने लोक कथाओं और गीतों के माध्यम से राम को जन-जन में स्थापित किया। उन्होंने जोर देकर कहा कि राम बुंदेलखंड के हास-परिहास, करुणा, स्नेह और संपत्ति-विपत्ति, हर परिस्थिति में विद्यमान हैं।

उद्घाटन सत्र का संचालन डॉ. अमर कुमार जैन ने किया और आभार डॉ. आशीष द्विवेदी ने व्यक्त किया। संगोष्ठी में रिपोर्टिंग और मीडिया समन्वय का महत्वपूर्ण दायित्व डॉ. रेणु सोलंकी, डॉ. संदीप सबलोक एवं रश्मि दुबे ने संभाली।

अगस्त्य संस्थान भोपाल के अध्यक्ष श्री प्रभु दयाल मिश्र की अध्यक्षता में संगोष्ठी के द्वितीय सत्र में ‘बुंदेलखंड के ऐतिहासिक पटल पर श्रीराम की भूमिका’ विषय पर चर्चा करते हुए नॉर्वे से पधारे मुख्य वक्ता एवं प्रवासी साहित्यकार डॉ. सुरेश चंद्र शुक्ला ने कहा कि भगवान श्रीराम का व्यक्तित्व भौगोलिक सीमाओं से परे है। उन्होंने कहा, “सिर्फ बुंदेलखंड या भारत ही नहीं, बल्कि नॉर्वे समेत दुनिया के कई देशों में श्रीराम के व्यक्तित्व को आत्मसात किया गया है। उनके आदर्श आज भी वैश्विक शांति और मानवीय मूल्यों के लिए पथ-प्रदर्शक हैं।


इस सत्र में डॉ नागेश दुबे डॉ. किरण आर्य तथा डॉ आशीष द्विवेदी ने भी अपने विचार रखते हुए बुंदेलखंड के जनमानस में भगवान श्री राम के विराट स्वरूप पर चर्चा की।
इस अवसर पर महाविद्यालय के शोधपरक वातावरण को दर्शाती पांच से अधिक पुस्तकों और पत्रिकाओं का विमोचन किया गया, जिनमें मुख्य रूप से ‘बुंदेलखंड एक दृष्टि – बुंदेली विश्वकोश’, ‘पर्यावरणीय चुनौतियां’, ‘उत्कर्ष’ (ई-जर्नल), और ‘अन्त्योदय न्यूज बुलेटिन’ शामिल रहे। सत्र के द्वितीय सत्र में डॉ हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय से चंदा बैन ने कहा रामचरितमानस के प्रत्येक पात्र में राम समाए हुए हैं।

वरिष्ठ पत्रकार एवं हिन्‍दुस्‍थान समाचार के ब्‍यूरो प्रमुख डॉ. मयंक चतुर्वेदी ने भगवान श्री राम के नाम की वैज्ञानिक व्याख्या करते हुए उनकी सार्थकता को सिद्ध किया। डॉ हरि सिंह गौर विश्वविद्यालय के प्राध्यापक शशि किरण सिंह ने कहा कि लोक के लिए श्री राम ने अपना संपूर्ण जीवन के सुख वैभव का त्याग किया। टीकाराम त्रिपाठी ने कहा बुंदेलखंड में शपथ के रूप में भी रामदई कहा जाता है जो इस बात का प्रमाण है की राम का जीवन बुंदेलखंड में व्याप्त है। पूर्व अतिरिक्त संचालक डॉ राधास बल्लभ शर्मा ने प्रश्नोत्तरी के माध्यम से अपनी बात कही। कार्यक्रम का संचालन डॉ रेणु सोलंकी तथा आभार डॉ शुचिता अग्रवाल ने किया।
कार्यक्रम की अंतिम सत्र में श्री राम के ऊपर काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें अशोक मिजाज, डॉ श्याम मनोहर सिरोठिया, पूरन सिंह राजपूत, की विशिष्ट उपस्थिति में आयोजित किया गया। काव्य गोष्ठी का संचालन डॉ शैलेंद्र राजपूत ने किया। यह संगोष्ठी कुल छह सत्रों में आयोजित की जा रही है, जिसमें दूसरे दिन मंगलवार को भी कई महत्वपूर्ण शोध पत्र पढ़े जाएंगे।

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