March 17, 2026

मातृत्व अधिकारों का विस्तार: सुप्रीम कोर्ट ने गोद लेने वाली महिलाओं के हक में दिया अहम फैसला

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नई दिल्ली। देश में मातृत्व अधिकारों को लेकर एक बड़ा और अहम फैसला सामने आया है। Supreme Court of India ने स्पष्ट किया है कि अब तीन महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिलाओं को भी मैटरनिटी लीव का पूरा अधिकार मिलेगा। यह फैसला उन हजारों महिलाओं के लिए राहत लेकर आया है, जो अब तक कानूनी पाबंदियों के कारण मातृत्व अवकाश से वंचित रह जाती थीं। कोर्ट ने कहा कि मातृत्व अवकाश का उद्देश्य केवल जन्म के तुरंत बाद की देखभाल तक सीमित नहीं है, बल्कि मां और बच्चे के बीच भावनात्मक संबंध को मजबूत करना भी उतना ही जरूरी है।

पुराना नियम क्यों था भेदभावपूर्ण

पहले कानून के तहत केवल उन महिलाओं को 12 हफ्तों का मैटरनिटी लीव मिलता था, जो तीन महीने तक के बच्चे को गोद लेती थीं। लेकिन Supreme Court of India ने इस प्रावधान को भेदभावपूर्ण करार दिया। कोर्ट ने सामाजिक सुरक्षा संहिता के सेक्शन 60(4) को रद्द करते हुए कहा कि यह संविधान के Article 14 और Article 21 का उल्लंघन करता है। न्यायालय के अनुसार, किसी बच्चे की उम्र के आधार पर मां को अधिकार देना या उससे वंचित करना समानता के सिद्धांत के खिलाफ है।

मां-बच्चे के रिश्ते को दी प्राथमिकता

अदालत ने अपने फैसले में इस बात पर जोर दिया कि मातृत्व अवकाश का असली मकसद मां और बच्चे के बीच आत्मीय रिश्ता विकसित करना और बच्चे की समुचित देखभाल सुनिश्चित करना है। यह प्रक्रिया केवल नवजात शिशु तक सीमित नहीं होती, बल्कि बड़े बच्चों के लिए भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती है। कोर्ट ने कहा कि जो महिलाएं बड़े बच्चों को गोद लेती हैं, उन्हें भी उतना ही समय और समर्थन चाहिए, ताकि वे बच्चे को नया और सुरक्षित वातावरण दे सकें।

पितृत्व अवकाश पर भी दिया अहम सुझाव

इस ऐतिहासिक फैसले के साथ ही Supreme Court of India ने केंद्र सरकार को पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) को लेकर भी ठोस कानून बनाने की सलाह दी है। अदालत ने कहा कि बच्चों की परवरिश केवल मां की जिम्मेदारी नहीं होनी चाहिए, बल्कि पिता की भूमिका भी उतनी ही अहम है। यदि पितृत्व अवकाश को कानूनी रूप दिया जाता है, तो इससे परिवार और समाज दोनों को लाभ मिलेगा।

कामकाजी महिलाओं के लिए क्यों अहम है फैसला

यह निर्णय खासतौर पर उन कामकाजी महिलाओं के लिए महत्वपूर्ण है, जो किसी कारणवश नवजात के बजाय बड़े बच्चे को गोद लेती हैं। अब उन्हें मातृत्व अवकाश के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकेगा। इससे गोद लेने की प्रक्रिया को भी प्रोत्साहन मिलेगा और अधिक बच्चे बेहतर पारिवारिक माहौल पा सकेंगे।

सामाजिक बदलाव की दिशा में कदम

विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला केवल कानूनी बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक सोच में बदलाव का संकेत भी है। इससे गोद लेने की प्रक्रिया को नया आयाम मिलेगा और समाज में समानता तथा संवेदनशीलता को बढ़ावा मिलेगा।

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