सरकारी वकील उज्ज्वल निकम ने बयां किया आर्म्स एक्ट की सजा के वक्त का पूरा कोर्ट रूम ड्रामा
मुंबई की विशेष टाडा अदालत में चल रहे इस लंबे मुकदमे के दौरान पूरे देश की निगाहें संजय दत्त पर टिकी हुई थीं। उज्ज्वल निकम के अनुसार, फैसला आने वाले दिन अदालत कक्ष के भीतर भारी तनाव और सन्नाटा पसरा हुआ था। संजय दत्त को उस समय सबसे बड़ा डर इस बात का था कि क्या उन पर देशद्रोह या आतंकवादी गतिविधियों में शामिल होने का ठप्पा लगेगा। जब अदालत ने उन्हें टाडा यानी आतंकवादी और विघटनकारी गतिविधियां अधिनियम के तहत लगे गंभीर आरोपों से बरी कर दिया, तो उनके चेहरे पर कुछ पल के लिए राहत जरूर दिखी थी। लेकिन इसके तुरंत बाद जब गैर-कानूनी हथियार रखने के आरोप में आर्म्स एक्ट के तहत उन्हें दोषी ठहराया गया, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई।
उज्ज्वल निकम ने बताया कि टाडा के आरोपों से मुक्ति मिलने के बाद संजय दत्त को लगा था कि शायद वे पूरी तरह बच जाएंगे या उन्हें प्रोबेशन का लाभ मिल जाएगा। लेकिन कानून अपनी राह पर चल रहा था। जैसे ही न्यायाधीश ने आर्म्स एक्ट के तहत सजा की अवधि का ऐलान करना शुरू किया, संजय दत्त के शरीर में कंपन होने लगा। निकम ने उस दृश्य को याद करते हुए साझा किया कि अभिनेता के हाथ-पैर कांप रहे थे और वह अदालत में खड़े होने की स्थिति में भी नहीं दिख रहे थे। उनकी आंखें आंसुओं से भर गईं और वह पूरी तरह लाचार नजर आने लगे थे। एक ऐसा अभिनेता जिसे स्क्रीन पर हमेशा कड़े और मजबूत किरदारों में देखा गया था, वह कानून के सामने पूरी तरह बेबस खड़ा था।
अभियोजन पक्ष के रूप में उज्ज्वल निकम ने संजय दत्त के खिलाफ आर्म्स एक्ट के तहत कड़ी सजा की वकालत की थी क्योंकि देश की सुरक्षा के दृष्टिकोण से प्रतिबंधित हथियार रखना एक अक्षम्य अपराध था। निकम ने खुलासा किया कि सजा के बाद संजय दत्त ने उनकी तरफ देखा था और उनकी आंखों में अपने भविष्य को लेकर एक गहरा डर और असमंजस साफ दिखाई दे रहा था। इस ऐतिहासिक मामले में संजय दत्त को पांच साल के कारावास की सजा सुनाई गई थी, जिसके बाद उन्हें यरवदा जेल भेजा गया। उज्ज्वल निकम का यह संस्मरण न केवल एक वीआईपी आरोपी की न्यायिक प्रक्रिया के दौरान की मनोवैज्ञानिक स्थिति को दर्शाता है, बल्कि यह भी साबित करता है कि कानून की नजर में कोई भी व्यक्ति अपने प्रभाव या शोहरत के बल पर बच नहीं सकता।
