October 12, 2026

PM मोदी की जिनपिंग को दो टूक… बोले- सीमा पर शांति होगी .. तभी आगे बढ़ेंगे रिश्ते…

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नई दिल्ली।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (Prime Minister Narendra Modi) ने पिछले सप्ताह ब्रिक्स शिखर सम्मेलन (BRICS Summit) से इतर चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग (Chinese President Xi Jinping) के साथ हुई मुलाकात के दौरान चीन के साथ संबंधों को लेकर भारत (India) की चिंताओं को स्पष्ट रूप से सामने रखा। भारत सरकार के अनुसार, मोदी ने कहा कि दोनों देशों को एक-दूसरे की मूल चिंताओं के प्रति संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मुलाकात के संबंध में विदेश मंत्रालय चीनी पक्ष की ओर से जारी बयान पर पूछे गए सवाल का जवाब दिया। चीनी बयान में मोदी के हवाले से कहा गया था कि तिब्बत और ताइवान को लेकर भारत की स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया है और भारत अपनी धरती पर किसी को भी चीन विरोधी गतिविधियां संचालित करने की अनुमति नहीं देता। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, ‘प्रधानमंत्री ने भारतीय चिंताओं का भी उल्लेख किया और इस बात पर जोर दिया कि दोनों पक्षों को एक-दूसरे की मूल चिंताओं के प्रति संवेदनशीलता दिखानी चाहिए।’


सीमा पर शांति को रिश्ते आगे बढ़ाने की बुनियाद बताया

जायसवाल ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने शी जिनपिंग के साथ बातचीत में इस बात पर जोर दिया कि दोनों देशों के बीच संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए सीमा पर शांति और स्थिरता जरूरी है। प्रधानमंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि दोनों पक्षों को तीन पारस्परिक सिद्धांतों- आपसी सम्मान, आपसी हित और आपसी संवेदनशीलता से निर्देशित होना चाहिए।


भारत ने चीन के साथ संबंधों में अपनी चिंताएं रखीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शी जिनपिंग को यह भी स्पष्ट किया कि सीमा पर शांति दोनों देशों के बीच संबंधों को आगे बढ़ाने के लिए एक आवश्यक आधार है। भारत और चीन के बीच सीमा पर बार-बार पैदा हुए तनाव के बीच भारत ने पिछले 16 वर्षों से सार्वजनिक रूप से अपनी ‘वन चाइना’ नीति को उसी तरह स्पष्ट रूप से व्यक्त करना बंद कर दिया है।


तिब्बत और ताइवान पर भारत की नीति में बदलाव नहीं

हालांकि व्यवहार में तिब्बत और ताइवान को लेकर भारत की स्थिति लगातार बनी हुई है। केंद्र सरकार का कहना है कि ताइवान को लेकर उसकी नीति स्पष्ट और निरंतर है। भारत व्यापार, निवेश, पर्यटन, संस्कृति, शिक्षा और लोगों के बीच आपसी संपर्क जैसे क्षेत्रों में ताइवान के साथ संबंधों को बढ़ावा देता है और सहयोग की सुविधा प्रदान करता है।


तिब्बत को लेकर भारत का रुख भी स्पष्ट

तिब्बत के मामले में भारत अब भी यह मानता है कि तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र चीन जनवादी गणराज्य के क्षेत्र का हिस्सा है। यह स्थिति वर्ष 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और चीन के तत्कालीन प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के बीच हस्ताक्षरित ‘संबंधों और व्यापक सहयोग के सिद्धांतों पर घोषणा’ में भी दर्ज की गई थी। इस घोषणा में यह भी कहा गया था कि भारत अपनी जमीन से तिब्बतियों को चीन विरोधी राजनीतिक गतिविधियां संचालित करने की अनुमति नहीं देता।


चीन के बयान में भारत की स्वतंत्र विदेश नीति का भी जिक्र
चीनी पक्ष की ओर से जारी बयान के अनुसार, प्रधानमंत्री मोदी ने शी जिनपिंग से यह भी कहा कि भारत एक स्वतंत्र विदेश नीति का पालन करता है और चीन के प्रति भारत के दृष्टिकोण का किसी तीसरे देश से कोई लेना-देना नहीं है। हालांकि, भारत की ओर से जारी आधिकारिक बयान में तिब्बत या ताइवान का कोई उल्लेख नहीं किया गया।


‘दोस्त, प्रतिद्वंद्वी नहीं’ वाले फॉर्मूले पर भी चर्चा

दिलचस्प बात यह है कि इस बार भारत ने अपने बयान में चीन के उस ‘दोस्त, प्रतिद्वंद्वी नहीं’ वाले फॉर्मूले का इस्तेमाल नहीं किया, जिसका उल्लेख पिछले साल तियानजिन में मोदी-शी मुलाकात के बाद चीन की ओर से जारी बयान में किया गया था।


जयशंकर और वांग यी की बातचीत में भी उठा था मुद्दा

जुलाई में मनीला में विदेश मंत्री एस. जयशंकर की अपने चीनी समकक्ष वांग यी के साथ हुई मुलाकात के बाद भी चीन ने जयशंकर के हवाले से भारत द्वारा चीन की संप्रभुता का सम्मान करने जैसी बातें कही थीं। इसके बाद विदेश मंत्रालय ने स्पष्टीकरण जारी करते हुए कहा था कि जयशंकर ने वांग यी से बातचीत में यह बात कही थी कि संप्रभुता से जुड़े मुद्दे भारत को चीन के सामने उठाने चाहिए।

चीन के कब्जे को लेकर भारत ने जताई आपत्ति
उन्होंने कहा कि भारत किसी भी तरह से चीन की संप्रभुता का उल्लंघन नहीं करता। हालांकि, चीन 1963 से जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के कुछ हिस्सों पर अवैध कब्जा किए हुए है, जबकि इन क्षेत्रों पर भारत के अधिकार को चीन भी स्वीकार करता रहा है।

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