September 13, 2026

लंबा मिर्गी का दौरा रोकने में काम आ सकती है क्लोबाजाम 95 मरीजों पर हुई स्टडी में सामने आए अहम नतीजे

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नई दिल्ली। मिर्गी के मरीजों के लिए सामने आई एक नई रिसर्च में लंबे समय तक चलने वाले दौरे को रोकने के लिए मुंह में घुलने वाली क्लोबाजाम को संभावित विकल्प के तौर पर देखा गया है। AIIMS दिल्ली और जीबी पंत इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एजुकेशन एंड रिसर्च से जुड़े शोधकर्ताओं की स्टडी में क्लोबाजाम की तुलना नाक के जरिए दी जाने वाली मिडाजोलम से की गई। शोधकर्ताओं ने पाया कि दोनों दवाओं के बीच लंबे दौरे को रोकने के समय में सांख्यिकीय रूप से कोई महत्वपूर्ण अंतर नहीं था।

यह रिसर्च खास तौर पर उन स्थितियों को ध्यान में रखकर की गई जिसमें मिर्गी का दौरा सामान्य अवधि से ज्यादा समय तक जारी रहता है। ऐसे लंबे दौरे में जल्द उपचार जरूरी होता है क्योंकि स्थिति गंभीर हो सकती है। अध्ययन में दो मिनट से ज्यादा समय तक चलने वाले दौरे को रेस्क्यू मेडिसिन देने के लिए आधार बनाया गया। रिसर्च का उद्देश्य यह समझना था कि मुंह में घुलने वाली क्लोबाजाम और नाक से दी जाने वाली मिडाजोलम में से कौन सा विकल्प ऐसे दौरे को जल्दी रोकने में प्रभावी है।

स्टडी में कुल 95 मरीजों को शामिल किया गया। सभी मरीज ड्रग रेसिस्टेंट मिर्गी से जूझ रहे थे और उन्हें AIIMS की Epilepsy Monitoring Unit में भर्ती किया गया था। मरीजों को दो समूहों में बांटा गया। 47 मरीजों को नाक के जरिए मिडाजोलम दी गई जबकि 48 मरीजों को मुंह में घुलने वाली क्लोबाजाम दी गई। अध्ययन एक सिंगल सेंटर प्रोस्पेक्टिव रैंडमाइज्ड ट्रायल था और मरीजों में लंबे दौरे के दौरान क्लिनिकल और EEG दोनों स्तर पर असर को देखा गया।

रिसर्च में क्लिनिकल दौरा रोकने का औसत समय मिडाजोलम समूह में करीब 20.5 सेकंड रहा जबकि क्लोबाजाम समूह में यह करीब 42 सेकंड था। EEG के जरिए दिमाग की इलेक्ट्रिकल गतिविधि में दौरा रुकने का औसत समय मिडाजोलम समूह में करीब 46 सेकंड और क्लोबाजाम समूह में करीब 54 सेकंड रहा। हालांकि इन अंतर को सांख्यिकीय रूप से महत्वपूर्ण नहीं पाया गया। इसका मतलब यह है कि इस अध्ययन के आधार पर क्लोबाजाम को मिडाजोलम से स्पष्ट रूप से बेहतर या खराब नहीं माना जा सकता।

इस रिसर्च की एक अहम बात यह भी है कि क्लोबाजाम को मुंह में घुलने वाले रूप में दिया गया। दौरे के दौरान मरीज को सामान्य गोली निगलने में परेशानी हो सकती है। ऐसे में मुंह में घुलने वाला फॉर्म दवा देने का व्यावहारिक विकल्प हो सकता है। वहीं नाक से दी जाने वाली मिडाजोलम भी रेस्क्यू मेडिसिन के तौर पर इस्तेमाल की जाती है लेकिन इसकी उपलब्धता और इस्तेमाल से जुड़ी परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। शोधकर्ताओं ने क्लोबाजाम को सुविधाजनक और संभावित रूप से कम लागत वाले विकल्प के तौर पर आगे अध्ययन किए जाने की जरूरत बताई है।

अध्ययन में दोनों समूहों में गंभीर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पाए गए और उपचार विफल होने या दौरे के दोबारा आने की महत्वपूर्ण समस्या भी दर्ज नहीं हुई। हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि यह एक सीमित मरीजों वाली सिंगल सेंटर स्टडी थी। इसलिए इसके आधार पर हर मरीज के लिए क्लोबाजाम को मिडाजोलम की जगह इस्तेमाल करने की सलाह नहीं दी जा सकती।

रिसर्च का महत्व इस बात में है कि लंबे दौरे के दौरान आसानी से दी जा सकने वाली रेस्क्यू मेडिसिन के विकल्पों पर काम आगे बढ़ रहा है। शोधकर्ताओं के अनुसार मुंह में घुलने वाली क्लोबाजाम को लेकर बड़े और अलग-अलग परिस्थितियों में किए गए अध्ययनों की जरूरत है। मरीजों और परिवारों को किसी भी रेस्क्यू दवा का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह और निर्धारित योजना के अनुसार ही करना चाहिए। मिर्गी के लंबे या लगातार दौरे की स्थिति में तत्काल चिकित्सकीय मदद लेना जरूरी है।

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