July 23, 2026

जंतर मंतर से संसद तक गूंजा आंदोलन, राहुल गांधी के प्रदर्शन के बाद सरकार ने वांगचुक से की मुलाकात

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नई दिल्ली । जंतर मंतर पर चल रहे आंदोलन ने देश की राजनीति में नया मोड़ ला दिया है। लंबे समय तक आंदोलन को सीमित मानकर चल रही केंद्र सरकार ने अब अपना रुख बदलते हुए सक्रिय पहल शुरू कर दी है। राहुल गांधी के प्रधानमंत्री आवास के निकट धरने के बाद घटनाक्रम तेजी से बदला और सरकार ने न केवल अनशन पर बैठे सोनम वांगचुक से संपर्क किया बल्कि आंदोलन में घायल छात्रों से मिलने के लिए केंद्रीय मंत्रियों को अस्पताल भी भेजा। इसके साथ ही संसद में इस मुद्दे पर चर्चा कराने की विपक्ष की मांग को भी सरकार ने स्वीकार कर लिया।

नीट पेपर लीक और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर शुरू हुआ आंदोलन शुरुआती दिनों में सीमित दायरे में दिखाई दे रहा था। जंतर मंतर पर कम संख्या में प्रदर्शनकारियों की मौजूदगी को देखते हुए माना जा रहा था कि यह आंदोलन ज्यादा प्रभाव नहीं डाल पाएगा। लेकिन जैसे जैसे छात्रों का समर्थन बढ़ा और संसद मार्च के बाद आंदोलन ने नया स्वरूप लिया वैसे वैसे राजनीतिक माहौल भी बदलने लगा।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि राहुल गांधी के धरने ने इस आंदोलन को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दी। इसके बाद सरकार ने तेजी से अपनी रणनीति में बदलाव किया। कई दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक से मिलने केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह पहुंचे और उनसे अनशन समाप्त करने की अपील की। इससे पहले आंदोलन के प्रतिनिधियों को सरकार से मिलने के लिए लंबा इंतजार करना पड़ा था लेकिन बाद में परिस्थितियां तेजी से बदल गईं।

सरकार ने संसद में इस पूरे मुद्दे पर चर्चा के लिए भी सहमति जताई। हालांकि विपक्ष ने इस पर नई शर्त रखते हुए कहा कि चर्चा तभी सार्थक होगी जब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान अपने पद से इस्तीफा देंगे। इसके बाद इस मुद्दे पर सरकार और विपक्ष के बीच राजनीतिक टकराव और तेज होने के संकेत मिल रहे हैं।

इस बीच सोनम वांगचुक ने सोशल मीडिया पर एक पत्र साझा करते हुए बताया कि विभिन्न राजनीतिक दलों के लगभग 65 सांसदों ने उन्हें पत्र लिखकर या व्यक्तिगत रूप से मिलकर अनशन समाप्त करने का आग्रह किया है। उन्होंने लिखा कि सभी ने उन्हें याद दिलाया है कि देश और शिक्षा के क्षेत्र में उनका योगदान अभी बाकी है। वांगचुक ने कहा कि वह भी जीना चाहते हैं और अपने छात्रों तथा शिक्षा से जुड़े कार्यों में जल्द लौटना चाहते हैं लेकिन आंदोलन के उद्देश्यों को लेकर उनकी प्रतिबद्धता बनी हुई है।

विश्लेषकों का मानना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और भर्ती प्रक्रियाओं में पारदर्शिता को लेकर युवाओं में पहले से ही असंतोष था। यही कारण है कि आंदोलन धीरे धीरे व्यापक समर्थन हासिल करता गया और सरकार को अपनी रणनीति बदलने के लिए मजबूर होना पड़ा।

फिलहाल सरकार और आंदोलनकारियों के बीच संवाद की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है लेकिन आंदोलन पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि संसद में होने वाली चर्चा और सरकार के अगले कदम इस पूरे विवाद का क्या समाधान निकालते हैं।

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