July 16, 2026

न्यायिक सेवा के दौरान कारोबार के आरोपों पर पूर्व चीफ जस्टिस की LPG डीलरशिप रद्द

0
22-1784197098
नई दिल्ली । मणिपुर हाई कोर्ट के पूर्व मुख्य न्यायाधीश और दिल्ली हाई कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश रहे सेवानिवृत्त जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल से जुड़ा एक मामला सामने आने के बाद न्यायिक आचार संहिता और संवैधानिक पदों की गरिमा को लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है। आरोप है कि न्यायिक सेवा में रहते हुए उनका नाम एक एलपीजी डिस्ट्रीब्यूशन एजेंसी से जुड़ा रहा। मामले की जांच के बाद भारत पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (बीपीसीएल) ने संबंधित एलपीजी डीलरशिप को रद्द कर दिया है।

जानकारी के अनुसार, जस्टिस सिद्धार्थ मृदुल का नाम ‘किचन फ्लेम’ नामक एलपीजी डिस्ट्रीब्यूशन एजेंसी से जुड़ा होने का आरोप लगाया गया है। कहा गया कि न्यायिक पद पर रहते हुए भी एजेंसी का संचालन उनके नाम से जारी रहा। न्यायिक सेवा के दौरान किसी भी प्रकार के व्यावसायिक या संविदात्मक संबंधों को लेकर लागू आचार संहिता के संदर्भ में इस मामले को गंभीर माना जा रहा है।

मामले की जांच के दौरान बीपीसीएल ने संबंधित तथ्यों की समीक्षा की। कंपनी के अनुसार, संवैधानिक पद पर रहते हुए किसी व्यवसाय से जुड़े रहने के आरोपों को ध्यान में रखते हुए संबंधित पक्ष को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया था। निर्धारित अवधि के भीतर संतोषजनक जवाब प्राप्त नहीं होने पर कंपनी ने छह जुलाई को डीलरशिप रद्द करने का निर्णय लिया। इसके बाद संबंधित एजेंसी का अनुबंध समाप्त कर दिया गया।

बताया गया है कि यह मामला सबसे पहले एजेंसी के पूर्व प्रबंधक की पत्नी द्वारा मालिकाना अधिकार को लेकर उठाए गए विवाद के बाद सामने आया। इसके बाद संबंधित दस्तावेजों और अभिलेखों की जांच के दौरान यह मुद्दा व्यापक रूप से चर्चा में आया। शिकायत मिलने के बाद कंपनी ने अपने स्तर पर जांच प्रक्रिया शुरू की और उपलब्ध तथ्यों के आधार पर कार्रवाई की।

न्यायिक आचार संहिता के अंतर्गत यह स्पष्ट माना जाता है कि किसी भी संवैधानिक अदालत के न्यायाधीश को प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किसी व्यापार, व्यवसाय या लाभकारी गतिविधि से नहीं जुड़ना चाहिए। इसका उद्देश्य न्यायपालिका की निष्पक्षता, स्वतंत्रता और सार्वजनिक विश्वास को बनाए रखना है। इसी सिद्धांत के आधार पर न्यायाधीशों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने कार्यकाल के दौरान किसी भी प्रकार के व्यावसायिक हितों से दूर रहें।

बताया गया कि वर्ष 2025 में कंपनी को इस संबंध में शिकायत प्राप्त हुई थी, जिसके बाद नोटिस जारी कर स्पष्टीकरण मांगा गया। कंपनी का कहना है कि संतोषजनक जवाब नहीं मिलने के कारण नियमानुसार डीलरशिप समाप्त करने की कार्रवाई की गई। हालांकि, इस पूरे मामले में न्यायिक या अन्य सक्षम प्राधिकरण की ओर से आगे की किसी कार्रवाई को लेकर कोई आधिकारिक जानकारी सामने नहीं आई है।

विशेषज्ञों का मानना है कि न्यायपालिका से जुड़े मामलों में आचार संहिता का पालन संस्थागत विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। ऐसे मामलों में तथ्यों की निष्पक्ष जांच और नियमों के अनुरूप कार्रवाई को न्याय व्यवस्था में जनता के विश्वास से जोड़कर देखा जाता है। फिलहाल यह मामला न्यायिक नैतिकता और संवैधानिक पदों से जुड़े आचरण को लेकर व्यापक चर्चा का विषय बना हुआ है।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may have missed