October 6, 2026

WHO की पहल से आयुर्वेद पर वैज्ञानिक शोध को मिलेगा बढ़ावा

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विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी WHO ने पारंपरिक चिकित्सा को लेकर वैश्विक स्तर पर वैज्ञानिक शोध को बढ़ावा देने की योजना बनाई है। 2025 से 2034 तक की इस रणनीति का उद्देश्य पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों की सुरक्षा प्रभावशीलता और उपयोगिता को वैज्ञानिक प्रमाणों के आधार पर समझना है। इस पहल में लकवा मानसिक स्वास्थ्य दर्द हड्डियों और मांसपेशियों से जुड़ी बीमारियों कैंसर और प्रजनन स्वास्थ्य जैसी महत्वपूर्ण समस्याओं को शोध के लिए प्राथमिकता देने की बात कही गई है। भारत के लिए यह पहल खास मानी जा रही है क्योंकि आयुर्वेद समेत कई पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों का यहां लंबे समय से इस्तेमाल होता रहा है।

WHO के मुताबिक दुनियाभर में बड़ी संख्या में लोग पारंपरिक चिकित्सा का इस्तेमाल करते हैं लेकिन स्वास्थ्य शोध के कुल बजट में इसके लिए एक प्रतिशत से भी कम हिस्सा उपलब्ध होता है। इसी कमी को दूर करने के लिए वैज्ञानिक शोध को बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। इसका मकसद केवल पारंपरिक उपचारों को बढ़ावा देना नहीं बल्कि उनके बारे में पर्याप्त वैज्ञानिक प्रमाण जुटाना भी है ताकि यह समझा जा सके कि कौन से उपचार सुरक्षित और प्रभावी हैं तथा किन उपचारों से मरीजों को नुकसान पहुंचने का खतरा हो सकता है।

नई रणनीति के तहत ऐसी स्वास्थ्य समस्याओं पर विशेष ध्यान दिया जाएगा जिनका असर बड़ी आबादी पर पड़ता है। इनमें लकवा मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं दर्द हड्डियों और मांसपेशियों की बीमारियां कैंसर और प्रजनन स्वास्थ्य शामिल हैं। बच्चों और बुजुर्गों के स्वास्थ्य के साथ बीमारी से बचाव और बीमारी के बाद स्वास्थ्य सुधार जैसे विषय भी शोध के दायरे में रहेंगे। शोध के जरिए यह समझने की कोशिश होगी कि पारंपरिक चिकित्सा इन क्षेत्रों में रोकथाम उपचार और रिकवरी में किस तरह उपयोगी हो सकती है।

इस पूरी प्रक्रिया में आधुनिक वैज्ञानिक तकनीक का इस्तेमाल भी किया जाएगा। स्वास्थ्य संबंधी वास्तविक आंकड़ों के साथ डिजिटल तकनीक कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नए शोध तरीकों की मदद ली जा सकती है। इससे अलग अलग पारंपरिक उपचार पद्धतियों को अधिक व्यवस्थित तरीके से समझने और उनके संभावित फायदे तथा जोखिम का आकलन करने में मदद मिलेगी। WHO की योजना में आदिवासी समुदायों और पारंपरिक ज्ञान रखने वाले लोगों की भागीदारी को भी महत्व दिया गया है।

भारत के लिए आयुर्वेद के संदर्भ में यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि देश में आयुष पद्धतियों का इस्तेमाल व्यापक स्तर पर होता है। भारत सरकार के अनुसार आयुष क्षेत्र में पिछले वर्षों में आर्थिक गतिविधियों और निर्यात में भी वृद्धि हुई है। आयुष बाजार 2014 में 2.85 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2023 में 43.4 अरब अमेरिकी डॉलर होने की जानकारी दी गई है। इसी अवधि में आयुष निर्यात 1.09 अरब अमेरिकी डॉलर से बढ़कर 2.16 अरब अमेरिकी डॉलर बताया गया है।

राष्ट्रीय प्रतिदर्श सर्वेक्षण कार्यालय के 2022 से 2023 के बीच किए गए अखिल भारतीय सर्वेक्षण में भी आयुष को लेकर लोगों में व्यापक जागरूकता सामने आई थी। सर्वेक्षण के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 94.8 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 96 प्रतिशत आयुष जागरूकता दर्ज की गई। वहीं पिछले 365 दिनों में उपचार या रोकथाम के लिए आयुष का इस्तेमाल करने वालों का अनुपात ग्रामीण क्षेत्रों में 46.3 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 52.9 प्रतिशत था। उपचार के लिए आयुर्वेद सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली आयुष पद्धति के रूप में सामने आया।

हालांकि पारंपरिक चिकित्सा को लेकर वैज्ञानिक शोध बढ़ने का अर्थ यह नहीं है कि हर पारंपरिक उपचार अपने आप प्रभावी या सुरक्षित साबित हो जाएगा। किसी भी उपचार की उपयोगिता उसके वैज्ञानिक प्रमाणों और सुरक्षा संबंधी आंकड़ों के आधार पर ही तय की जानी चाहिए। WHO की यह पहल इसी दिशा में शोध और प्रमाण जुटाने पर जोर देती है। इससे भविष्य में पारंपरिक चिकित्सा और आधुनिक स्वास्थ्य व्यवस्था के बीच वैज्ञानिक आधार पर संवाद और सहयोग के नए रास्ते खुल सकते हैं।

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