शहीद दिवस रैली से ठीक पहले कामरहाटी के कद्दावर विधायक ने छोड़ी पार्टी, भ्रष्टाचार के संगीन आरोप लगा कर दी खुली चुनौती
एक प्रमुख बांग्ला समाचार चैनल को दिए गए अपने विस्तृत साक्षात्कार में पूर्व तृणमूल नेता ने पार्टी के भीतर व्याप्त सांगठनिक ढांचे और नेतृत्व की कार्यशैली पर कड़ा प्रहार किया। उन्होंने बेहद आक्रामक लहजे में खुले मंच से यह दावा किया कि वह इस तथ्य को पूरी तरह साबित कर सकते हैं कि वर्तमान सत्ता पक्ष की टीम में शामिल प्रत्येक दस में से आठ लोग भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। उन्होंने स्वयं को पूरी तरह से पाक-साफ बताते हुए नेतृत्व को खुली चुनौती दी कि यदि कोई भी व्यक्ति उनके खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों को प्रमाणित कर देता है, तो वह राजनीति छोड़ने के साथ-साथ अत्यंत कठोर कदम उठाने से भी पीछे नहीं हटेंगे। उन्होंने विपक्ष के खेमे में जाने और वहां मौजूद अन्य नेताओं के संदर्भ में पूछे गए सवालों पर स्पष्ट किया कि परिस्थितिजन्य राजनीति के तहत बड़े सांगठनिक बदलाव अब अवश्यंभावी हो चुके हैं।
अभिषेक बनर्जी के पार्टी में तेजी से बढ़ते प्रभाव और उनके काम करने के तौर-तरीकों को मुख्य निशाना बनाते हुए मदन मित्रा ने भूतकाल की राजनीतिक घटनाओं का भी जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि जब अभिषेक बनर्जी ने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया था, तब उनके सामने संगठन में पार्थ चटर्जी, मुकुल रॉय और सुब्रत बख्शी जैसे अत्यंत अनुभवी और वरिष्ठ चेहरे मौजूद थे। आरोप के अनुसार, इन वरिष्ठ चेहरों को आगे रखकर पृष्ठभूमि से पूरी तरह से समानांतर सत्ता चलाने का प्रयास किया गया। मित्रा ने वर्तमान सांगठनिक गतिविधियों को बेहद नकारात्मक बताते हुए आरोप लगाया कि समकालीन राजनीति में इतनी जटिल और रणनीतिक प्रवृत्तियां किसी अन्य नेता में नहीं हैं और उनके सामने विरोधी राजनीतिक दल जैसे माकपा और भाजपा के नेता भी काफी पीछे नजर आते हैं।
राजनीतिक हलकों में इस प्रकार के तीखे बयानों के बाद संभावित सुरक्षा खतरों और पार्टी की ओर से होने वाली किसी भी जवाबी कार्रवाई के डर के संबंध में पूछे गए प्रश्नों का मदन मित्रा ने बेहद बेबाकी से जवाब दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि अब उनके मन से किसी भी प्रकार का राजनीतिक या प्रशासनिक भय पूरी तरह समाप्त हो चुका है और वह मानसिक रूप से पूरी तरह शांत हैं। उन्होंने आगे पलटवार करते हुए कहा कि उनके ऊपर किसी भी प्रकार का दबाव बनाने या संगठनात्मक हमला करने का साहस विरोधियों में नहीं है। अभिषेक बनर्जी के क्षेत्रीय जनाधार पर गंभीर सवालिया निशान लगाते हुए उन्होंने दावा किया कि उनके स्थानीय क्षेत्र के नागरिक भी उनके साथ खड़े नहीं हैं, जिसके संबंध में विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक आंकड़ों का हवाला दिया गया है, जिसका आज तक संगठन की ओर से कोई आधिकारिक खंडन जारी नहीं किया जा सका है।
