October 8, 2026

RBI ने अचानक बढ़ाया रेपो रेट, महंगे हो सकते हैं होम लोन और EMI, महंगाई के बीच क्यों लिया गया बड़ा फैसला

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नई दिल्ली ।भारतीय रिजर्व बैंक ने बुधवार को रेपो रेट में 25 बेसिस पॉइंट की बढ़ोतरी का ऐलान किया। इसके साथ नीतिगत दर 5.25 प्रतिशत से बढ़कर 5.50 प्रतिशत हो गई है। फरवरी 2023 के बाद यह पहली बार है जब केंद्रीय बैंक ने रेपो रेट में वृद्धि की है। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितताएं बनी हुई हैं और कच्चे तेल की कीमतों में तेजी महंगाई के दबाव को बढ़ा रही है।

यह फैसला आरबीआई गवर्नर संजय मल्होत्रा की अध्यक्षता वाली छह सदस्यीय मौद्रिक नीति समिति की तीन दिवसीय बैठक के बाद लिया गया। केंद्रीय बैंक ने मौद्रिक नीति के दूसरे हिस्सों में भी बदलाव किया है। स्टैंडिंग डिपॉजिट फैसिलिटी यानी एसडीएफ दर को बढ़ाकर 5.25 प्रतिशत कर दिया गया है। वहीं, मार्जिनल स्टैंडिंग फैसिलिटी यानी एमएसएफ दर और बैंक रेट को 5.75 प्रतिशत पर समायोजित किया गया है।

रेपो रेट वह दर है जिस पर आरबीआई वाणिज्यिक बैंकों को अल्पकालिक अवधि के लिए धन उपलब्ध कराता है। इसमें बढ़ोतरी होने पर बैंकों के लिए केंद्रीय बैंक से कर्ज लेना महंगा हो जाता है। इसका असर आगे चलकर ग्राहकों को दिए जाने वाले कर्ज पर पड़ सकता है। होम लोन, कार लोन और पर्सनल लोन की ब्याज दरों में वृद्धि होने पर नई और मौजूदा ईएमआई महंगी होने की संभावना रहती है।

आरबीआई ने रेपो रेट बढ़ाने के पीछे वैश्विक अनिश्चितताओं और बढ़ते महंगाई दबाव को प्रमुख वजहों में रखा है। गवर्नर संजय मल्होत्रा ने मौद्रिक नीति की घोषणा करते हुए कहा कि दुनिया में मुद्रास्फीति के दोबारा तेज होने की आशंका बनी हुई है। इसी वजह से कई प्रमुख केंद्रीय बैंक अपनी मौद्रिक नीतियों को और सख्त करने की दिशा में कदम उठा रहे हैं।

कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी भी केंद्रीय बैंक के लिए चिंता का विषय है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं। तेल की कीमतों में लंबे समय तक तेजी रहने से परिवहन और उत्पादन लागत प्रभावित हो सकती है, जिसका असर घरेलू और वैश्विक महंगाई पर पड़ सकता है।

देश में महंगाई के ताजा आंकड़े भी दबाव की ओर संकेत कर रहे हैं। अगस्त में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक यानी सीपीआई आधारित महंगाई दर बढ़कर 4.82 प्रतिशत पहुंच गई थी, जबकि जुलाई में यह 4.45 प्रतिशत थी। इस बढ़ोतरी ने कीमतों को लेकर आरबीआई की चिंताओं को बढ़ाया है। इसके अलावा अल नीनो प्रभाव और कम वर्षा के कारण रबी फसल के उत्पादन पर जोखिम भी बना हुआ है।

रेपो रेट में बढ़ोतरी की संभावना को लेकर अर्थशास्त्रियों और बाजार विशेषज्ञों के बीच पहले से चर्चा थी। एसबीआई रिसर्च ने बढ़ते महंगाई दबाव, वैश्विक आर्थिक अनिश्चितताओं, बदलती तरलता स्थिति और जोखिमों के दोबारा आकलन को देखते हुए समय रहते कदम उठाने की जरूरत बताई थी।

आरबीआई के इस फैसले का सीधा असर बैंकिंग व्यवस्था और कर्ज की लागत पर पड़ सकता है। ब्याज दरों में बदलाव का असर किस तरह और कितनी तेजी से ग्राहकों तक पहुंचेगा, यह बैंकों के कर्ज और जमा दरों में किए जाने वाले अगले बदलावों पर निर्भर करेगा। फिलहाल केंद्रीय बैंक का फैसला महंगाई और वैश्विक जोखिमों के बीच मौद्रिक नीति को संतुलित रखने की दिशा में उठाया गया कदम है।

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