विश्व डाक दिवस: दूतों और घोड़ा डाक से ईमेल तक, हजारों साल में कैसे बदल गई संदेश पहुंचाने की दुनिया?
प्राचीन समय में संदेश पहुंचाने के लिए आज की तरह डाकघर, डाक टिकट या नियमित डाक वितरण व्यवस्था नहीं थी। राजा-महाराजा और शासक अपने संदेश एक स्थान से दूसरे स्थान तक पहुंचाने के लिए पैदल दूतों और घुड़सवार संदेशवाहकों की मदद लेते थे। शासन व्यवस्था के विस्तार के साथ दूर-दराज के क्षेत्रों तक सूचनाएं पहुंचाने की जरूरत भी बढ़ती गई। भारत में दिल्ली सल्तनत के दौरान प्रशासनिक संदेशों के लिए डाक व्यवस्था का इस्तेमाल किया जाता था। अलाउद्दीन खिलजी के समय घोड़े और पैदल संदेशवाहकों के जरिए सूचनाएं पहुंचाने की व्यवस्था का उल्लेख मिलता है। बाद में शेरशाह सूरी ने सड़कों और सरायों के नेटवर्क के साथ घोड़ा डाक व्यवस्था को मजबूत किया। इन व्यवस्थाओं ने संदेश पहुंचाने के संगठित तरीकों के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
अठारहवीं सदी में भारत में डाक व्यवस्था का स्वरूप अधिक व्यवस्थित होने लगा। ब्रिटिश शासन के दौरान प्रशासनिक जरूरतों के लिए डाक सेवाओं का विस्तार किया गया। वर्ष 1774 में कलकत्ता के जनरल पोस्ट ऑफिस की स्थापना को इस विकास का महत्वपूर्ण पड़ाव माना जाता है। इसके बाद मद्रास और बॉम्बे में भी जनरल पोस्ट ऑफिस स्थापित किए गए। वर्ष 1854 में भारतीय डाक व्यवस्था के विकास को नई दिशा मिली और डाक शुल्क, टिकट तथा वितरण प्रणाली को अधिक व्यवस्थित किया गया। इससे विभिन्न क्षेत्रों के बीच पत्र भेजना आसान हुआ। डाक टिकटों ने भी इस व्यवस्था को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई। वर्ष 1852 में सिंध क्षेत्र में ‘सिंध डाक’ टिकट जारी किया गया, जिसे भारत के शुरुआती डाक टिकटों में गिना जाता है। वर्ष 1854 में ऐसे टिकट जारी किए गए जिनका इस्तेमाल व्यापक स्तर पर किया जा सकता था। इससे पहले वर्ष 1840 में ब्रिटेन का ‘पेनी ब्लैक’ जारी हो चुका था, जिसे दुनिया का पहला चिपकने वाला डाक टिकट माना जाता है।
डाक व्यवस्था का विस्तार होने के साथ डाकिया आम लोगों के जीवन का अहम हिस्सा बन गया। मोबाइल और इंटरनेट के दौर से पहले चिट्ठियां दूर रहने वाले रिश्तेदारों और मित्रों से संपर्क बनाए रखने का प्रमुख माध्यम थीं। नौकरी के पत्र, सरकारी सूचनाएं, परीक्षा परिणाम और व्यक्तिगत संदेश डाक के जरिए पहुंचते थे। मनी ऑर्डर की सुविधा ने भी लोगों को दूर रहकर अपने परिवारों तक पैसे भेजने में मदद की। विशेष रूप से उन इलाकों में यह सुविधा उपयोगी थी, जहां बैंकिंग सेवाओं की पहुंच सीमित थी। पोस्टकार्ड ने कम खर्च में संदेश भेजना आसान बनाया, जबकि रेलवे मेल सर्विस ने लंबी दूरी तक डाक पहुंचाने की गति बढ़ाई। इस तरह सड़क और रेल के बाद हवाई परिवहन ने भी डाक व्यवस्था में महत्वपूर्ण बदलाव लाया।
भारत में वर्ष 1911 में इलाहाबाद से नैनी के बीच पहली आधिकारिक हवाई डाक उड़ान हुई। यह उड़ान करीब 18 किलोमीटर की दूरी तक गई थी। उस समय डाक को हवाई मार्ग से पहुंचाना संचार व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण प्रयोग था। इसके बाद परिवहन के आधुनिक साधनों ने दूरस्थ स्थानों तक पत्र और जरूरी दस्तावेज पहुंचाने की क्षमता बढ़ाई। हर साल 9 अक्टूबर को विश्व डाक दिवस मनाया जाता है। इसी तारीख को वर्ष 1874 में यूनिवर्सल पोस्टल यूनियन की स्थापना हुई थी। इसका उद्देश्य अलग-अलग देशों की डाक सेवाओं के बीच सहयोग बढ़ाना और अंतरराष्ट्रीय डाक व्यवस्था को बेहतर बनाना था।
भारत की आजादी के बाद डाक सेवाओं का विस्तार ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों तक किया गया। समय के साथ डाकघरों ने चिट्ठियों के अलावा बचत, बीमा और अन्य सेवाएं भी उपलब्ध करानी शुरू कीं। वर्ष 1986 में स्पीड पोस्ट की शुरुआत ने जरूरी पत्रों और दस्तावेजों को तेजी से पहुंचाने का विकल्प दिया। इसके बाद टेलीफोन, फैक्स और ईमेल ने संचार की गति और बढ़ा दी। इंटरनेट के विस्तार के साथ नौकरी के आवेदन, व्यावसायिक पत्राचार और दस्तावेज इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भेजे जाने लगे। मोबाइल फोन, एसएमएस और इंस्टेंट मैसेजिंग ऐप ने इस बदलाव को और तेज कर दिया। अब संदेशों के साथ फोटो, वीडियो, ऑडियो और दस्तावेज भी तुरंत साझा किए जा सकते हैं।
डिजिटल संचार के विस्तार के बावजूद डाक सेवा की उपयोगिता समाप्त नहीं हुई है। आज डाक विभाग पार्सल, लॉजिस्टिक्स, बैंकिंग, बीमा और कई सरकारी सेवाओं से भी जुड़ा है। भारत में 1.55 लाख से अधिक डाकघरों का नेटवर्क दूरदराज के क्षेत्रों तक सेवाएं पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। चिट्ठियों की संख्या में बदलाव आया है, लेकिन डाक व्यवस्था नए समय की जरूरतों के अनुसार अपना स्वरूप बदल रही है। वहीं, हाथ से लिखी चिट्ठियों का भावनात्मक महत्व भी बरकरार है। पुरानी चिट्ठियां लोगों को रिश्तों, यादों और बीते समय से जोड़ती हैं। दूतों से शुरू हुआ संदेश पहुंचाने का सफर आज डिजिटल मैसेजिंग तक पहुंच चुका है, लेकिन अपनों तक अपनी बात पहुंचाने की मानवीय जरूरत अब भी पहले जैसी है।
